शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः ५५
जीते हुये राजाओं के देश में सदा अपना न्यायालय स्थापित करे अर्थात् अपना शासन रखे। विजित राजा के रहन-सहन के अनुरूप भरण-पोषण के लिये वेतन का प्रबन्ध कर दे।
स्वानुरक्तां सुरूपां च सुवस्त्रां प्रियवादिनीम् ॥ ३८० ॥
सुभूषणां सुसुशुद्धां प्रमदां शयने भजेत् ।
यामद्वयं शयानो हि त्वत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ ३८१ ॥
अपने में अनुराग रखनेवाली, सुन्दर रूपवती, अच्छे वस्त्र पहने हुये; प्रियभाषिणी, सुन्दर भूषणों से युक्त, शुद्ध आचरणवाली ऐसी स्त्री के साथ संभोग करे। दो प्रहर तक सोनेवाला राजा अत्यन्त सुख भोगता है।
न संत्यजेच्च स्वस्थानं नीत्या शत्रुगणं जयेत् ।
स्थानभ्रष्टा नो विभान्ति दंताः केशा नखा नृपाः ॥ ३८२ ॥
राजा अपने स्थान का परित्याग न करे किन्तु नीति से शत्रुगण को जीते क्योंकि स्थान से भ्रष्ट हुये दांत, केश नख तथा राजा नहीं सुशोभित होते हैं।
संश्रयेद् गिरिदुर्गाणि महापदि नृपः सदा ।
तदाश्रयाद्दस्युवृत्त्या स्वराज्यं तु समाहरेत् ॥ ३८३ ॥
बड़ी भारी आपत्ति आपड़ने पर राजा सदा पहाड़ी किलों का आश्रय ले। उसके आश्रय में रहकर दस्यु-वृत्ति (डाकूजीवन) से अपने राज्य को पुनः ले ले।
विवाहदानयज्ञार्थं विनाऽप्यष्टांशशेषितम् ।
सर्वतस्तु हरेद्दस्युरसतामखिलं धनम् ॥ ३८४ ॥
दस्यु राजा विवाह, दान, यज्ञ आदि के लिये अष्टमांश धन छोड़कर शेष को सबसे हरण करे और दुर्जनों के सम्पूर्ण धन को लूट ले।
नैकत्र संवसेन्नित्यं विश्वसेन्नैव कं प्रति ।
सदैव सावधानः स्यात्प्राणनाशं न चिन्तयेत् ॥ ३८५ ॥
क्रूरकर्मा सदोद्युक्तो निर्घृणो दस्युकर्मसु ।
विमुखः परदारेषु कुलकन्याप्रदूषणे ॥ ३८६ ॥
और दस्युवृत्ति राजा एक जगह स्थिर होकर निवास न करे, और किसी का विश्वास न करे। सदैव सावधान होकर प्राणनाश का परवाह न करे, क्रूर कर्म करनेवाला, सदा दस्युओं के कर्म करने में उद्योग युक्त, दयाहीन, परत्रियों की तरफ उन्मुख नहीं होनेवाला, एवं कुलीन कन्याओं को नहीं भ्रष्ट करनेवाला हो।
पुत्रवत्पालिता भृत्याः समये शत्रुतां गताः ।
न दोषः स्यात्प्रयत्नस्य भागधेयं स्वयं हि तत् ॥ ३८७ ॥