शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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नीति-विद्या तथा इसके पर्याय
'नीति' शब्द प्रापण के अर्थ में प्रयुज्यमान नी (णीञ् प्रापणे) धातु से 'स्त्रियां क्तिन्' प्रत्यय के द्वारा व्युत्पन्न होता है। अतः इसका अर्थ है 'प्रापण'। परन्तु प्रापण एक सकर्मक क्रिया है अतः इसकी पूर्णता के लिए संक्षेप में चार तत्त्वों की आवश्यकता है—कर्त्ता, कर्म, अपादान तथा स्वयम् क्रिया। साथ ही प्रापण एक प्रेरणार्थक क्रिया है अतः इसके दो कर्म होंगे, एक तो अप्रेरणावस्था का कर्त्ता (प्रयोज्य कर्त्ता) तथा एक अप्रेरणावस्था का कर्म। एवञ्च 'नीति' शब्द का स्पष्ट अर्थ है एक मार्ग (अपादान कारक) से किसी व्यक्ति-विशेष (अप्रेरणावस्था का कर्त्ता तथा प्रापण-क्रिया का कर्म) को दूसरे मार्ग (अप्रेरणावस्था तथा प्रेरणावस्था का कर्म) पर ले जाना या पहुंचाना। पहुंचाने वाला (अर्थात् इस क्रिया का कर्त्ता) कौन हो सकता है इसका विवेचन आगे किया जायगा। यह तो विचार करने पर स्पष्ट ही हो जाता है कि यदि कोई व्यक्ति उचित मार्ग पर स्वयम् बर्त्तमान है तो उसे दूसरे मार्ग पर ले जाना निरर्थक है। मार्गान्तर पर ले जाने की आवश्यकता तो तब होती है यदि कोई व्यक्ति मार्ग-च्युत, अर्थात् अनुचित मार्ग, पर हो। अत एव यह सिद्ध है कि अनुचित मार्ग से किसी व्यक्ति को उचित मार्ग पर ले आने की क्रिया ही परमार्थतः 'नीति' है। अत एव यह कहा गया है—
'नयनात्' नीतिरुच्यते' ॥
अब हमें यह देखना चाहिए कि इस नीति का कर्त्ता या स्वाभाविक अधिकारी कौन है। नीति-विद्या के अद्वितीय परिष्कारक भीष्म का कथन है कि चातुर्वर्ण्य के धर्म के विप्लव का प्रतिरोध राजा का ही कर्त्तव्य है।$^२$ 'राजनीति-प्रकाश' में उद्धृत 'मत्स्य-पुराण' के कथन से यह अर्थ और भी$^३$ स्पष्टतर हो जाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य$^४$ का भी यही मत है। अन्यान्य
१. शु० नी० सा० १।५६ ॥
२. चातुर्वर्ण्यस्य धर्माश्च रक्षितव्या महीक्षिता ।
धर्म-सङ्कर-रक्षा च राज्ञां धर्मः सनातनः ॥ म० भा० (शा० प०) ५७।१५ ॥
३. स्वे स्वे धर्मे व्यवस्थानम् वर्णानां पृथिवीपतेः ।
परो धर्मः सदा प्रोक्तः तत्र यत्नपरो भवेत् ॥
स्वं-धर्म-प्रच्युतान् राजा स्वे स्वे धर्मे नियोजयेत् ।
व्यवस्थानम् = व्यवस्थापनम् । रा० नी० प्र०, पृ० १२१ (चौखम्बा) ॥
४. कुलानि जातीः श्रेणीश्च गणान् जानपदानपि ।
स्व-धर्मात् चलितान् राजा विनीय स्थापयेत्पथि ॥ या०स्मृ० १।३६१ ॥