शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 168, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें८२ | शुक्रनीतिः
करनेवाला, निस्पृह, अतिथियों का संमान करनेवाला, नित्य दानशील हो, उसे 'सत्राधिप' ( यज्ञ-विभाग का अध्यक्ष ) बनाना चाहिये ।
परोपकारनिरतः परमर्माप्रकाशकः । निर्मत्सरो गुणग्राही सद्भिद्यः स्यात् परीक्षकः ॥ १७० ॥
**परीक्षक के लक्षण—**जो परोपकार में निरत रहनेवाला, दूसरे के मर्म अर्थात् मर्म को विदीर्ण करनेवाले दोष को नहीं प्रकाशित करनेवाला, मत्सरता से शून्य ( दूसरे के शुभ में द्वेष न रखनेवाला ), गुणग्राही और जिस विषय की परीक्षा लेता हो उसको जाननेवाला हो उसे 'परीक्षक' ( परीक्षा लेनेवाला ) बनाना चाहिये ।
प्रजा नष्टा न हि भवेत्तथा दण्डविधायकः । नातिक्रूरो नातिमृदुः साहसाधिपतिश्च सः ॥ १७१ ॥
**साहसाधिप के लक्षण—**प्रजा जिससे नष्ट न हो जाय ऐसे दण्ड का विधान करनेवाला, अत्यन्त क्रूरता तथा मृदुता को नहीं करनेवाला जो होता है वही 'साहसाधिपति' ( चोर आदि का शासन करने के लिये अध्यक्ष फौजदारी ) पद के योग्य होता है ।
आधर्षकेभ्यश्चोरेभ्यो ह्यधिकारिगणात्तथा । प्रजासंरक्षणे दक्षो ग्रामपो मातृपितृवत् ॥ १७२ ॥
**ग्रामाधिप के लक्षण—**डाकू, चोर तथा राज्य के उच्छृङ्खल अधिकारी पुरुषों से माता-पिता की भांति जो अपनी प्रजा की रक्षा करने में निपुण होता है । वही 'ग्रामप' ( ग्रामपति ) पद के योग्य होता है ।
वृक्षान् संपुष्य यत्नेन फलं पुष्पं विचिन्वति । मालाकार इवात्यन्तं भागहारस्तथाविधः ॥ १७३ ॥
**कर वसूल करनेवाले के लक्षण—**जिस प्रकार से माली अत्यन्त यत्न से वृक्षों को बढ़ाकर उससे फल तथा पुष्प का संग्रह करता है उसी प्रकार से प्रजाओं से जो राजा का भाग ( कर = मालगुजारी ) ग्रहण करनेवाला हो वैसा 'भागहार' बनाना चाहिये ।
गणनाकुशलो यस्तु देशभाषाप्रभेदवित् । असन्दिग्धमगूढार्थं बिलिखेत्स च लेखकः ॥ १७४ ॥
**लेखक के लक्षण—**जो गणना ( गिनती ) करने में कुशल, देश की भाषाओं के भेदों को जाननेवाला, एवं सन्देहरहित तथा अर्थ समझने लायक स्पष्ट लिखनेवाला होता है, उसे 'लेखक' पद पर नियुक्त करना चाहिये ।
शस्त्रास्त्रकुशलो यस्तु दृढाङ्गश्च निरालसः । यथायोग्यं समाहूयात् प्रनम्रः प्रतिहारकः ॥ १७५ ॥