शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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राज्य का मूल शिथिल होने लग जाता है। परन्तु यह समझना चाहिए कि कोई भी दण्ड स्वभावतः तीक्ष्ण या उचित नहीं होता। अपराध तथा देश-काल आदि के साथ सामञ्जस्य रखने वाला कोई भी दण्ड उचित कहला सकता है और इसके विपरीत होने पर अनुचित या तीक्ष्ण। जैसे—एक हत्यारे के लिए प्राण-दण्ड को तीक्ष्ण नहीं कहा जा सकता पर यदि एक साधारण चोर को वही दण्ड दिया जाय तो वह अवश्य ही तीक्ष्ण-दण्ड कहलाएगा। अतः राजा को दण्ड-प्रयोग के प्रसङ्ग में अत्यन्त विवेक-पूर्ण होना चाहिए। यद्यपि शुक्र-नीति-सार में यत्र-तत्र¹ अपने राज्य में दण्ड के प्रयोग का प्रतिषेध किया गया है तथापि उसका तात्पर्य अनुचित दण्ड के प्रतिषेध तथा उपायान्तर के सार्थक होने पर दण्ड के प्रतिषेध से है। जहाँ तक उचित दण्ड का प्रश्न है उसका क्षेत्र संकुचित नहीं है। चाहे मित्र हो या शत्रु, अपराध के अनुसार नियमतः दण्ड-भागी होता है। अत एव महाभारत² तथा मनु-स्मृति आदि ग्रन्थों में प्रजा-मात्र के प्रति दण्ड का अनुविधान किया गया है। दण्ड के क्षेत्र का निर्देश हमारे महाकवि भारवि के निम्न-लिखित श्लोक में बहुत ही स्पष्ट रूप में किया गया है :—
वसूनि वाञ्छन्न वशी न मन्युना स्व-धर्म इत्येव निवृत्त-कारणः।
गुरुपदिष्टेन रिपौ सुतेऽपि वा निहन्ति दण्डेन स धर्म-विप्लवम् ॥³
समीक्ष्य सं धृतः सम्यक् सर्वाः रञ्जयति प्रजाः।
असमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वतः ॥ म० स्मृ० ७।१९ ॥
त्रिवर्गं वर्धयत्याशु राज्ञो दण्डो यथा-विधि।
प्रणीतोऽन्याञ्ज (र) मञ्जस्यात् वनस्थानपि कोपयेत् ॥ का० नी० २।३७ ॥
१. स्व-प्रजानां न भेदेन नैव दण्डेन पालनम्।
कुर्वीत साम-दानाभ्याम् सर्वदा यत्नमास्थितः ॥
स्व-प्रजा-दण्ड-भेदैश्च भवेद्राज्य-विनाशनम्।
स्व-प्रजा-दण्डनाच्छ्रेयः कथं राज्ञो भविष्यति ॥
— शु० नी० सा० ४।३८, ३९, ५२ ॥
२. दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वाः दण्ड एवाभिरक्षति।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥
— म० भा० (शा० प०) १५।२; मत्स्य-पुराण २२४।१४-१५; तथा म० स्मृ० ७।१८ ॥
स्व-देशे पर-देशे वा धर्म-शास्त्र-विशारदान्।
समीक्ष्य प्रणयेद्दण्डं सर्वं दण्डे प्रतिष्ठितम् ॥ मत्स्य-पुराण २२४।४ ॥
३. किराताजुर्नीय—१।१३ ॥