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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 194
१०८शुक्रनीतिः

से दो प्रकार के हैं। इनमें से पार्थिव आय वह कहलाता है जो भूमि के भागों से उत्पन्न हो ।

स देवकृत्रिमजलैर्देशग्रामपुरैः पृथक् ॥ ३३४ ॥
बहुमध्याल्पफलतो भिद्यते भूविभागतः ।

**पार्थिव संज्ञक आय के भेद—**उस पार्थिवसंज्ञक आय के देवालयों, कृत्रिम ( कल्पित ) वस्तुओं, जल, देश, ग्राम तथा पुरों से पृथक्-पृथक् विभिन्न हुये भूमि-संबन्धी विभागों से एवं बहुत ( अधिक ), मध्यम तथा अल्प फलों से अनेक भेद होते हैं ।

शुल्कदण्डाकरकरभाटकोपायनादिभिः ॥ ३३५ ॥
इतरः कीर्त्तितस्तज्ज्ञैरायो लेखविशारदैः ।

**चल संज्ञक आय के लक्षण—**और व्यवसायी आदि लोगों से प्राप्त होने वाले शुल्क ( चुंगी-टैक्स ), दण्ड ( जुर्माना ), खान, कर ( मालगुजारी ), भाटक ( भाड़ा ), उपायन ( नजर-भेंट ), इत्यादि से होनेवाले आय को आय का ज्ञान रखनेवाले एवं लिखने में ( हिसाब लिखने में ) चतुर लोगों ने इतर अर्थात् चल-संज्ञक कहा है ।

यन्निमित्तो भवेदायो व्ययस्तन्नामपूर्वकः ॥ ३३६ ॥
व्ययश्चैव समुद्दिष्टो व्याप्यव्यापकसंयुतः ।

**विभागानुसार आय-व्यय के व्याप्य-व्यापक का निर्देश—**जिस निमित्त ( विभाग ) से जो आय होता है व्यय भी उसी निमित्त ( विभाग ) के नाम में होता है । अर्थात् जिस विभाग में आय होता है उस विभाग में व्यय भी होता है। और आय की भांति व्यय भी व्याप्य-व्यापक से युक्त है अर्थात् स्वल्प तथा बहुविषयक कहा हुआ है ।

पुनरावर्तकः स्वत्वनिवर्त्तक इति द्विधा ॥ ३३७ ॥
व्ययो यन्निध्युपनिधीकृतो विनिमयीकृतः ।
सकुसीदाकुसीदाधमर्णिकश्चावृत्तः स्मृतः ॥ ३३८ ॥

**व्यय के भेदों एवं पुनरावर्त्तक के लक्षण—**वह व्यय दो प्रकार का होता है, एक-पुनरावर्त्तक ( फिर लौटकर आनेवाला ), दूसरा स्वत्वनिवर्त्तक ( देने वाले के स्वत्व को निवृत्त करनेवाला ) कहलाता है । जो व्यय निधि, उपनिधि या विनिमय रूप में हुआ है एवं सूद-सहित या बिना सूद का इस भांति से दो प्रकार का आधमर्णिक ये सब आवृत्त ( पुनरावर्त्तक ) संज्ञक कहलाते हैं ।

निधिर्भूमौ विनिहितोऽन्यस्मिन्तुपनिधिः स्थितः ।
दत्तमूल्यादिसंप्राप्तः स वै विनिमयीकृतः ॥ ३३६ ॥
वृद्ध्याऽवृद्ध्या च यो दत्तः स वै स्यादाधमर्णिकः ।