शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १३४ | शुक्रनीतिः |
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और यदि किसी ने विश्वस्त या हितैषी योग्य व्यक्ति के बात को अहंकार-वश टालकर कोई कार्य करता है और उसका विपरीत ( बुरा ) फल पाता है तो उस पर उसका खेद करना वृथा है ।
सावधानमना नित्यं राजानं देवतां गुरुम् ।
अग्निं तपस्विनं धर्मज्ञानवृद्धं सुसेवयेत् ॥ ५१ ॥
**सावधानी से राजादि की सेवा करने का निर्देश—**सावधान-चित्त होकर राजा, देवता, गुरु, अग्नि, तपस्वी एवं धर्म वा ज्ञान में वृद्ध ( बड़े ) लोगों की नित्य अच्छी तरह से सेवा करनी चाहिये ।
मातृपितृगुरुस्वामि-भ्रातृपुत्रसखिष्वपि ।
न विरुध्येन्नापकुर्यान्मनसाऽपि क्षणं कचित् ॥ ५२ ॥
**माता आदि के साथ विरोधादि करने का निषेध—**माता, पिता, गुरु, स्वामी, भाई, पुत्र तथा मित्र इन सबों का क्षण भर के लिये मन से भी कभी विरोध या अपकार नहीं करना चाहिये ।
स्वजनैर्न विरुद्धयेत न स्पर्धेत बलीयसा ।
न कुर्यात् स्त्रीबालवृद्धमूर्खेषु च विवादनम् ॥ ५३ ॥
**स्वजनादि से विरोधादि एवं स्त्री आदि से विवाद का निषेध—**स्वजनों के साथ विरोध, बलवान के साथ स्पर्धा ( बराबरी का दावा ) एवं स्त्री, बालक, वृद्ध या मूर्ख के साथ विवाद कभी नहीं करना चाहिये ।
एकः स्वादु न भुञ्जीत एकोऽर्थान्न विचिन्तयेत् ।
एको न गच्छेदध्वानं नैकः सुप्तेषु जागृयात् ॥ ५४ ॥
**अकेला स्वादिष्ट भोजनादि का निषेध—**अकेले स्वादिष्ट भोजन नहीं करना चाहिये, अकेले किसी कार्य के विषय में विचार नहीं करना चाहिये, अकेले मार्ग नहीं चलना चाहिये, और सोये हुये लोगों के बीच में अकेले नहीं जागना चाहिये ।
नान्यधर्मं हि सेवेत न द्रुह्याद्वै कदाचन ।
हीनकर्मगुणैः स्त्रीभिर्नासीतैकासने क्वचित् ॥ ५५ ॥
**अन्य धर्म के सेवन का निषेध—**और कभी भी दूसरे धर्म को स्वीकार या उसका द्रोह नहीं करना चाहिये । और कभी हीन कर्म या गुण वाले दुर्जनों एवं स्त्रियों के साथ एक आसन पर नहीं बैठना चाहिये ।
षड्दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥ ५६ ॥
प्रभवन्ति विघाताय कार्यस्यैते न संशयः ।
**त्याज्य निद्रादि दोषों का निर्देश—**इस संसार में १. निद्रा ( दिन में वा