शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें१५२ | शुक्रनीतिः
जारश्चोरो बलिद्विष्टो विषयी धनलोलुपः ।
कुसहायी कुनृपतिर्भिन्नामात्य-सुहृत्प्रजः ॥ १६० ॥
कुर्यात्तथा समीक्ष्यैतत् सुखं स्वप्याच्चिरं नरः ।
रात्रि में सुखपूर्वक न सो सकनेवालों का निर्देश— जो चिन्ता से परेशान, आधि (मानसिक पीड़ा) तथा व्याधि से पीड़ित, जार (व्यभिचारी), चोर, बलवान शत्रुवाला, विषय-लोलुप, धन-लोलुप होता है और जो बुरे साथियों-वाला, विरक्त मन्त्री, मित्र तथा प्रजा गणों से युक्त कुत्सित विचार का राजा है। ये सब रात्रि में भी सदा जागते रहते हैं। अतः मनुष्यों को उचित है कि विचार कर ऐसा कार्य करे जिससे बहुत दिनों तक सुखपूर्वक रात्रि में सो सके।
राज्ञो नानुकृतिं कुर्यान्न च श्रेष्ठस्य कस्यचित् ॥ १६१ ॥
नैको गच्छेद्व्याळव्याघ्रचोरेषु च प्रबाधितुम् ।
योग्यता न रहने पर बड़ों के अनुकरण करने एवं सर्पादि पकड़ने के लिये एकाकी गमन का निषेध— राजा या किसी श्रेष्ठ पुरुष के व्यवहार की योग्यता न रहने पर अनुकरण नहीं करना चाहिये। और व्याळ (सर्पादि), व्याघ्र तथा चौर को मारने या पकड़ने के लिये अकेले नहीं जाना चाहिये।
जिघांसन्तं जिघांसीयाद् गुरुमप्याततायिनम् ॥ १६२ ॥
कलहे न सहायः स्यात् संरक्षेद् बहुनायकम् ।
मारनेवाले गुरु को भी मारने का एवं कलह में सहायता न करने का निर्देश— अपने को मारने की इच्छा रखनेवाले एवं आततायी गुरुजन को भी मारने की इच्छा रखनी चाहिये। झगड़ा होने पर किसी पक्ष का साथी नहीं बनना चाहिये। और जो बहुत लोगों का स्वामी हो उसकी रक्षा करनी चाहिये।
गुरुणां पुरतो राज्ञो न चासीत महासने ॥ १६३ ॥
प्रौढपादो न तद्वाक्यं हेतुभिर्विकृतिं नयेत् ।
गुरुजनों के आगे प्रौढपाद बैठने का निषेध— गुरुजनों के तथा राजा के आगे उनसे ऊँचे आसन पर या पैर के ऊपर पैर रखकर नहीं बैठना चाहिये। और उनके वाक्यों का तर्क द्वारा खण्डन नहीं करना चाहिये।
यत्कर्तव्यं न जानाति कृतं जानाति चेतरः ॥ १६४ ॥
नैव वक्ति च कर्तव्यं कृतं यश्चोत्तमो नरः ।
उत्तम पुरुष के लक्षण— जो नीच मनुष्य होता है वह जो कर्तव्य (करने योग्य है) उसको नहीं जानता है किन्तु केवल कृत (किये हुये) को ही