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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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तृतीयोऽध्यायः '१५५

न त्याज्यौ तु क्षणकणौ नित्यं विद्याधनार्थिना ।

विद्या और धन का संचय करने का निर्देश — विद्या तथा धन चाहनेवाले को नित्य क्रम से क्षण तथा कण का त्याग ( 'थोड़ा है इससे क्या लाभ होगा' इस बुद्धि से उपेक्षा ) नहीं करनी चाहिये किन्तु क्षण २ भर प्रतिदिन अभ्यास करके विद्या का एवं कण २ भर का संग्रह कर धन का अर्जन करना चाहिये ।

सुभार्यापुत्रमित्रार्थं हितं नित्यं धनार्जनम् ॥ १७७ ॥
दानार्थं च विना त्वेतैः किं धनैश्च जनैश्च किम् ।

धनार्जन के उपयोगों का निर्देश — उत्तम भार्या, पुत्र या मित्र के लिये एवं दान के लिये तो नित्य धनार्जन करना हितकर है, अतः बिना इन सब भार्यादियों के धन और भृत्यादिजनों से क्या प्रयोजन है अर्थात् धनादि व्यर्थ है ।

भाबिसंरक्षणक्षमं धनं यत्नेन रक्षयेत् ॥ १७८ ॥
जीवामि शतवर्षं तु नन्दामि च धनेन च ।
इति बुद्ध्या सञ्चिनुयाद्धनं विद्यादिकं सदा ॥ १७९ ॥
पञ्चविंशत्यब्दपूरं तदर्थं वा तदर्द्धकम् ।

भविष्यकाल में रक्षा करने में समर्थ धन की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये । और १०० वर्ष तक मैं तो जीऊँगा एवं इस धन से आनन्द करूँगा — इस बुद्धि से धन और विद्या आदि का २५ वर्ष पर्यन्त या उसका आधा १२॥ वर्ष या उसका आधा ६। वर्ष पर्यन्त सदा संग्रह करना चाहिये ।

विद्याधनं श्रेष्ठतरं तन्मूलमितरद्धनम् ॥ १८० ॥
दानेन वर्धते नित्यं न भाराय न नीयते ।

धन की अपेक्षा विद्या की श्रेष्ठता का निर्देश — विद्यारूपी धन अत्यन्त श्रेष्ठ है, इससे अन्य धन विद्यामूलक है अर्थात् विद्या से ही अन्य धन का उपार्जन होता है क्योंकि यह विद्याधन देने से नित्य बढ़ता है, अन्य धन घटता है । और इसमें भार नहीं होता है, अन्य धन में भार होता है । एवं इसे कोई उठा कर नहीं ले जा सकता है, अन्य धन को उठा कर ले जा सकता है ।

अस्ति यावत्तु सधनस्तावत्सर्वैस्तु सेव्यते ॥ १८१ ॥
निर्धनस्त्यज्यते भार्यापुत्राद्यैः सगुणोप्यतः ।
संसृतौ व्यवहाराय सारभूतं धनं स्मृतम् ॥ १८२ ॥
अतो यतेत तत्प्राप्त्यै नरः सूपायसाहसैः ।

अवश्य धनार्जन करने का निर्देश — जब तक मनुष्य धनयुक्त रहता है तब तक सब लोग उसकी सेवा करते हैं और जब वही धन से रहित हो जाता