शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 243, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोग्ध्यायः १५७
वे देवे किन्तु घर में न रखे, क्योंकि पुत्रादि को ज्ञात होने पर उस धन की रक्षा असंभव हो जाती है।
नैवास्तिल्लिखितादन्यत् स्मारकं व्यवहारिणाम् ॥ १८९ ॥ न लेख्येन विना कुर्याद् व्यवहारं सदा बुधः ।
**व्यवहार में लेख की आवश्यकता का निर्देश—**व्यवहार (व्यवसाय) करनेवालों के लिये लेख से बढ़ कर दूसरा कोई स्मरणसूचक चिह्न नहीं है, इसलिये बुद्धिमान को सदा बिना लेख के व्यवहार (रुपया देना) नहीं करना चाहिये।
निर्लोभे धनिके राज्ञि विश्वस्ते क्षमिणां वरे ॥ १९० ॥ सुसञ्चितं धनं धार्यं गृहीतलेखितं तु वा।
लोभ से रहित धनी पुरुष या विश्वासपात्र या क्षमाशील किंवा श्रेष्ठ पुरुष अथवा राजा इनमें किसी एक के पास में अच्छी तरह से संचित धन को रखना चाहिये अथवा रखने के लिये लिये हुये धन को लिख लेने के बाद चाहे जिसके पास रखना चाहिये ।
मैत्र्यर्थे याचितं दद्यादकुसीदं धनं सदा ॥ १९१ ॥ तस्मिन् स्थितं चेन्न बहु हानिकृच्च तथाविधम् ।
**मित्रता के नाते बिना ब्याज के भी धन देने का निर्देश—**मित्रता के नाते मांगने पर मित्र के लिये बिना सूद पर धन सदा देना चाहिये और यदि उस मित्र के ऊपर वैसा बिना सूद पर लिया हुआ धन बहुत सा बाकी भी पड़ा हो तो भी पुनः देना हानिकर नहीं है। अर्थात् मित्र के लिये सभी सत्य है।
दृष्ट्वाऽधमर्णं वृद्ध्यापि व्यवहारक्षमं सदा ॥ १९२ ॥ सबन्धं सप्रतिभुवं धनं दद्याच्च साक्षिमत् । गृहीतलेखितं योग्यमानं प्रत्यागमे सुखम् ॥ १९३ ॥ न दद्याद् वृद्धिलोभेन नष्टं मूलधनं भवेत् ।
**लिखा-पढ़ी के साथ सूद पर धन देने का एवं अन्यथा रीति से न देने का निर्देश—**ऋण लेनेवाले को सूद देने में समर्थ देख कर सदा बन्धक या किसी के जमानत पर और किसी के गवाही के साथ लिखा-पढ़ी करके उचित मात्रा में, सुखपूर्वक लौटाने लायक धन देना चाहिये। और ब्याज के लोभ से उपर्युक्त रीति से भिन्न अवस्था में धन नहीं देना चाहिये नहीं तो मूल धन नष्ट हो जाने की संभावना रहती है।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत् ॥ १९४ ॥ धनं मैत्रीकरं दाने चादाने शत्रुकारकम् ।
**आहारादि में लज्जा-त्याग का निर्देश—**इस प्रकार से आहार-व्यवहार में