शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 248, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें१६२ | शुक्रनीतिः
नातिक्रौर्यं नातिशाठ्यं धारयेन्नातिमार्दवम् ॥ २१८ ॥
नातिवादं नातिकार्यासक्तिमत्याग्रहं न च ।
**क्रूरतादि करने में सर्वत्र अति का निषेध—**अत्यन्त क्रूरता (निष्ठुरता), अत्यन्त शठता, अत्यन्त मृदुता, अत्यन्त बातचीत, अत्यन्त कार्यों में लवलीनता, अत्यन्त आग्रह (हठ) इन सबों को नहीं करना चाहिये।
अति सर्वं नाशहेतुरर्थतोऽत्यन्तं विवर्जयेत् ॥ २१९ ॥
उद्वेजते जनः क्रौर्यात् कार्पण्यादतिनिन्दति ।
**अतिक्रूरता आदिकों से अनिष्ट फल का निर्देश—**किसी विषय में अति करना नाश का कारण होता है अतः उसे (अति करना) छोड़ देना चाहिये। और अत्यन्त क्रूरता करने से लोग विरक्त हो जाते हैं, अत्यन्त कृपणता (कंजूसी) से अत्यन्त निन्दा करते हैं।
मार्दवाञ्चैव गणयेदपमानोऽतिवादतः ॥ २२० ॥
अतिदानेन दारिद्र्यं तिरस्कारोऽतिलोभतः ।
अत्यन्त मृदुता से लोग उसे नहीं गिनते हैं (उसे कुछ नहीं समझते हैं), अत्यन्त बोलने से अपमान करते हैं, अत्यन्त दान से दरिद्रता होती है, अत्यन्त लोभ से तिरस्कार होता है।
अत्याग्रहान्नरस्यैव मौर्ख्यं सञ्जायते खलु ॥ २२१ ॥
अनाचाराद्धर्महानिरत्याचारस्तु मूर्खता ।
अत्यन्त आग्रह करने से मनुष्य की मूर्खता प्रकट होती है। आचार-विचार करने से अथवा दुष्ट आचरण करने से धर्म की हानि एवं आचार के विरुद्ध आचरण करने से भी मूर्खता समझी जाती है।
अधिकोऽस्मीति सर्वेभ्यो अधिकज्ञानवानहम् ॥ २२२ ॥
धर्मतत्त्वमिदमिति नैवं मन्येत बुद्धिमान् ।
**अपने को अधिक श्रेष्ठ मानने का निषेध—**मैं सबसे अधिक श्रेष्ठ या अधिक ज्ञान से युक्त हूँ, और 'धर्म का तत्त्व यही है' ऐसा बुद्धिमान् मनुष्य को नहीं समझना चाहिये।
तिमिङ्गिलगिलोऽप्यस्ति तद्गिलोऽप्यस्ति राघवः ॥ २२३ ॥
कश्चित्तु तद्गिलोऽस्तीति मत्वा मन्येत कर्हिचित् ।
तिमि नाम की एक बड़ी मछली समुद्र में होती है उसको निगलनेवाली उससे बड़ी 'तिमिङ्गिल' नामकी एक दूसरी मछली होती है और उसको निगलनेवाली और एक मछली होती है उसे 'तिमिङ्गिलगिल' कहते हैं, उसको निगलनेवाली 'राघव' मछली होती है। एवं इसको भी निगलनेवाली कोई सबसे बड़ी भी मछली होती है ऐसा समझकर सदा इसकी