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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 526 में से

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तृतीयोऽध्यायः १६७

यस्य मुक्तः खलः किं वा नररूपपशुश्च सः॥ २४८ ॥

**जीवन्मुक्त, खल वा पशु के तुल्य के लक्षण—**जिसका मन पढ़ाने या पढ़ने में और देवता, गुरु, ब्राह्मण, चित्रकला आदि कला, सङ्गीत, सेवा ( नौकरी ), सरलता, स्त्री, शूरता, तपस्या या साहित्य इनमें से किसी एक में भी नहीं रमता (लगता) है वह या तो जीवन्मुक्त या खल अथवा मनुष्य रूप में पशु है।

अन्योदयासहिष्णुश्च छिद्रदर्शी विनिन्दकः। द्रोहशीलः स्वान्तमलः प्रसन्नास्यः खलः स्मृतः॥ २४९ ॥

**खल पुरुष के लक्षण—**जो दूसरे के अभ्युदय (तरक्की) को नहीं सह सकनेवाला, दोष देखनेवाला, निन्दा करनेवाला, द्रोह रखनेवाला, मलिन हृदय-वाला, ऊपर प्रसन्नता दिखानेवाला होता है वह 'खल' कहलाता है।

एकस्यैव न पर्याप्तमस्ति यद् ब्रह्मकोशजम्। आशया वर्द्धितस्यास्ति तस्याल्पमपि पूर्तिकृत्॥ २५० ॥

**आशाबद्ध लोगों के लिये जगत् की सम्पूर्ण वस्तु की प्राप्ति से भी कमी बोध होने का निर्देश—**ब्रह्माण्ड के अन्दर विद्यमान जितनी वस्तुयें हैं वे सभी जिसकी आशा बढ़ी हुई है ऐसे अकेले एक पुरुष की थोड़ी भी इच्छापूर्ति के लिये पर्याप्त नहीं हैं अर्थात् उनकी इच्छा की पूर्ति ब्रह्माण्ड की सारी वस्तुओं से भी नहीं हो सकती है।

करोत्यकार्यं साशोऽन्यं बोधयत्यनुमोदते।

आशा से युक्त पुरुष न करने योग्य कार्य को भी स्वयं करता है और अन्य को भी वैसे कार्य करने के लिये समझाता है तथा अनुमोदन करता है।

भवन्त्यन्योपदेशार्थं धूर्त्ताः साधुसमाः सदा॥ २५१ ॥ स्वकार्यार्थ प्रकुर्व्वन्ति ह्यकार्याणांशतं तु ते।

**धूर्त पुरुष के कर्मों का निर्देश—**धूर्त लोग दूसरे को उपदेश देने के लिये अत्यन्त साधुपुरुषों के समान आचरण करते हैं किन्तु वे ही धूर्त स्वयं अपना कार्य सिद्ध करने के लिये सैकड़ों कुकृत्यों को कर डालते हैं।

पित्रोराज्ञां पालयति सेवने च निरालसः॥ २५२ ॥ छायेव वर्तते नित्यं यतते चागमाय वै। कुशलः सर्वविद्यासु स पुत्रः प्रीतिकारकः॥ २५३ ॥ दुःखदो विपरीतो यो दुर्गुणो धननाशकः।

**प्रीतिकारक व दुःखदायी पुत्र के लक्षण—**जो पुत्र माता-पिता की आज्ञा का पालन करता है और उनकी सेवा करने में आलस्य नहीं करता है बल्कि छाया की भाँति सदा उनका अनुगमन करता है, धन या विद्या का अर्जन करने के

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