शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७० : शुक्रनीतिः
निर्देश—जानकार व्यवसायी किसी कार्य (व्यवसाय) को आरम्भ करने के प्रथम यह कार्य कैसा है ? इसके कौन २ से साधन (उपाय) हैं ? इसमें कितना व्यय है ? इसकी निकास (खपत) कैसी है अथवा जो व्यय होगा उससे लाभ कैसा है ? इन सबों को भलीभांति विचार करके पश्चात् कार्य करता है अन्यथा बिना विचार किये कोई छोटा भी कार्य कभी नहीं करता है ।
न च व्ययाधिकं कार्यं कर्तुमीहेत पण्डितः ॥ २६५ लाभाधिक्यं यत्क्रियते स सेवेद् व्यवसायिभिः । मूल्यं मानं च पण्यानां याथात्म्यान्मृग्यते सदा ॥ २६६ ॥
अधिक व्ययवाले कार्यों को न करने तथा लाभवाले कार्यों को करने का निर्देश—विज्ञजन को अधिक व्यय और स्वल्प लाभवाले कार्य करने की इच्छा नहीं रखनी चाहिये । और जिसमें अधिक लाभ हो ऐसे कार्य व्यवसायियों को करना चाहिये अर्थात् इससे अन्य कम लाभवाले कार्य छोड़ देने चाहिये और सदा बेचने योग्य द्रव्यों के मूल्य तथा तौल या संख्या का यथार्थ रूप से ख्याल रखना चाहिये ।
तपःस्त्रीकृषिसेवासूपभोग्ये नापि भक्षणे । हितः प्रतिनिधिनित्यं कार्येऽन्ये तं नियोजयेत् ॥ २६७ ॥
तपस्यादि में प्रतिनिधि बनाने में हितकारिता के अभाव का निर्देश—तपस्या करना, स्त्री (पत्नी), कृषि (खेती), सेवा, किसी वस्तु का उपभोग करना, भोजन करना । इन सबों के लिए अपना प्रतिनिधि किसी को बनाना हितकर नहीं है अर्थात् हानि की सम्भावना है । इससे अन्य कार्यों में प्रतिनिधि की नियुक्ति ठीक होती है ।
निर्जनत्वं मधुरभुग् जारश्चोरः सदेच्छति । साहाय्यं तु बलिद्विष्टं वेश्या धनिकमित्रताम् ॥ २६८ ॥ कुनृपश्च छलं नित्यं स्वामिद्रव्यं कुसेवकः । तत्त्वं तु ज्ञानवान् दम्भं तपोऽग्निं देवजीवकः ॥ २६९ ॥
मधुरभोजी आदिको निर्जनता आदि की इच्छा रखने का निर्देश—मिठाई खानेवाला, स्त्री-लम्पट (व्यभिचारी), चोर ये सब सदा निर्जनता (एकान्त जहां पर कोई दूसरा न रहे) चाहते हैं । बली शत्रु से आक्रान्त हुआ पुरुष सहायता की, वेश्या-धनियों के साथ मित्रता की, दुष्ट राजा-छल की, दुष्ट नौकर स्वामी के धन की, ज्ञानी पुरुष तत्त्व जानने की, पुजारी (वेतन लेकर देवपूजा करनेवाला), दम्भ (पाखण्ड), तप और अग्नि की नित्य इच्छा करते हैं ।
योग्या कान्तं च कुलटा जारं वैद्यं च व्याधितः । घृतपण्यो महार्घत्वं दानशीलं तु याचकः ॥ २७० ॥