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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 260
.१७४शुक्रनीतिः

पावों में पहन लेना और थोड़े से ज्ञान से ही चतुर बनने से मूर्ख बनना अच्छा होता है।

परगृहनिवासाद्धरण्ये निवसनं वरम् ॥ २८८ ॥
प्रदुष्टभार्यागार्हस्थ्याद्वैद्यं वा मरणं वरम् ।

और दूसरे के गृह में निवास करने से जंगल में रहना और अत्यन्त दुष्टा स्त्री से गृहस्थी चलाने की अपेक्षा भीख मांगना यां मर जाना अच्छा है।

श्वमैथुनमृणं गर्भाधानं स्वामित्वमेव च ॥ २८९ ॥
खलसख्यमपथ्यं तु प्राक्सुखं दुःखनिर्गमम् ।

प्रथम सुखकर पश्चात् दुःखकर विषयों का निर्देश— कुत्तों का मैथुन करना, ऋण लेना, गर्भाधान होना, स्वामी बनना, दुष्टों के साथ मित्रता करना और कुपथ्य सेवन करना, ये सभी पहले सुखकर प्रतीत होते हैं पश्चात् दुःखदायी होते हैं।

कुमन्त्रिभिर्नृपो रोगी कुवैद्यैः कुनृपैः प्रजा ॥ २९० ॥
कुसन्तत्या कुलं चात्मा कुबुद्ध्या हीयतेऽनिशम् ।

कुमन्त्री आदिकों से राजादिकों के नाश का निर्देश— दुष्ट मन्त्रियों से राजा, अनाड़ी वैद्यों से रोगी, दुष्ट राजाओं से प्रजा, दुष्ट सन्तान से कुल, कुबुद्धि से आत्मा इन सबों की दिन पर दिन उत्तरोत्तर अवस्था बिगड़ती जाती है।

हस्त्यश्ववृषबालस्त्रीशुकानां शिक्षको यथा ॥ २९१ ॥
तथा भवन्ति ते नित्यं संसर्गगुणधारकाः ।

शिक्षकानुसार हस्त्यादि का सद्गुणादि के धारण करने का निर्देश— हाथी, घोड़ा, बैल, बालक, स्त्री तथा सुग्गा इन सबों के जैसे शिक्षक होते हैं उसके अनुसार ही वे संसर्गवश अच्छा या बुरा गुण धारण करनेवाले हो जाते हैं।

स्याज्ज्योऽवसरोक्त्या सद्वासनैः सुप्रसिद्धता ॥ २९२ ॥
सभायां विद्यया मानस्त्रितयं त्वधिकारतः ।

अधिकार प्राप्त होने पर स्वयं प्राप्त होनेवाली ३ बातें— उचित अवसर आने पर ही कहने या करने से किसी कार्य की सिद्धि होती है और अच्छे वस्त्रों के पहनने से लोगों के बीच में सुप्रसिद्धि एवं सभा में विद्या से मान (प्रतिष्ठा) प्राप्त होता है। किन्तु अधिकार प्राप्त होने पर (स्वामी बनने पर) उक्त ३ तीनों बातें स्वयं प्राप्त हो जाती हैं।

सुभार्या सुष्ठु चापत्यं सुविद्या सुधनं सुहृत् ॥ २९३ ॥
सुदासदास्यौ सद्देहः सद्देश्म सुन्नृपः सदा ।
गृहिणां हि सुखायालं दशैतानि न चान्यथा ॥ २९४ ॥