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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 262

१७६ | शुक्रनीतिः

**राजा को भी शान्त घोड़े आदि से भी बाजार के अन्दर न जाने का निर्देश—**सामर्थ्यशाली होकर भी कभी मार्ग रोक कर नहीं खड़ा रहना चाहिये। राजा को भी शान्त घोड़े आदि की सवारी से भी बाजार के अन्दर भीड़ में नहीं जाना चाहिये।

ससहायः सदा च स्यादध्वगो नान्यथा क्वचित् ॥ ३०० ॥
समीपसन्मार्गजलाभयग्रामेऽध्वगो वसेत् ।
तथाविधे वा विरमेन्न मार्गे विपिनेऽपि न ॥ ३०१ ॥

**पथिकों को यात्रा के समय कर्त्तव्या-कर्त्तव्य विषयों का निर्देश—**पथिक को साथी से युक्त सदा यात्रा करनी चाहिये, इससे अन्यथा अर्थात् बिना साथी के कभी नहीं यात्रा में रहना चाहिये। और उसे मार्ग के समीप जल की सुविधा से युक्त तथा किसी प्रकार के भय से रहित ग्राम में यात्रा के समय ठहरना चाहिये। भयरहित, जलयुक्त जो मार्ग न हों वहां पर एवं जंगल में विश्राम नहीं करना चाहिये।

अत्यटनं चानशनमतिमैथुनमेव च ।
अत्यायासश्च सर्वेषां द्राग्जराकरणं महत् ॥ ३०२ ॥
अत्यायासो हि विद्यासु जराकारी कलासु च ।

**शीघ्र वृद्धता लानेवाले विषयों का निर्देश—**अत्यन्त भ्रमण, उपवास, अत्यन्त मैथुन, अत्यन्त परिश्रम इन सबों के करने से सभी को शीघ्र अत्यन्त वृद्धता आ जाती है। और विद्याध्ययन तथा कलाओं के सीखने में अत्यन्त परिश्रम करना भी वृद्धावस्था ला देता है।

दुर्गुणं तु गुणीकृत्य कीर्तयेत् स प्रियो भवेत् ॥ ३०३ ॥
गुणाधिक्यं कीर्तयति यः किं स्यान्न पुनः सखा ।

**प्रिय होने के उपाय—**जो दुर्गुण को गुण बतलाकर उसका बखान करता है वह संसार का प्रिय होता है। और जो गुण को बढ़ा-चढ़ा कर प्रशंसा करता है वह क्यों न मित्र हो जाय, अर्थात् वह अवश्य मित्र हो जाता है।

दुर्गुणं वक्ति सत्येन प्रियोऽपि सोऽप्रियो भवेत् ॥ ३०४ ॥
गुणं हि दुर्गुणीकृत्य वक्ति यः स्यात्कथं प्रियः ।

**अप्रिय होने के कारणों का निर्देश—**जो सचमुच विद्यमान दुर्गुण को कहता है वह प्रिय होकर भी सुननेवाले का अप्रिय हो जाता है। और जो गुण को दुर्गुण बताकर कहता है वह भला कैसे प्रिय हो सकता है।

स्तुत्या वशं यान्ति देवा ह्यञ्जसा किं पुनर्नराः ॥ ३०५ ॥
प्रत्यक्षं दुर्गुणान्नैव वक्तुं शक्नोति कोऽप्यतः ।

**स्तुति से देवता के वशवर्ती होने का निर्देश—**जब स्तुति करने से देवता