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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 268

१८२ | शुक्रनीतिः

**बैरभाव रखनेवालों के दो लक्षणों का निर्देश—**एक वस्तु के विषय में दो व्यक्तियों का 'अपना १ स्वत्व जमाने की इच्छा रखना' अथवा 'एक दूसरे के अभीष्ट कार्य को नष्ट करना' ये दोनों लक्षण बैरभाव रखनेवालों के हैं।

भ्रातृभावेऽपि तु द्रव्यमखिलं मम वै भवेत् ।
न स्यादेतस्य वश्योऽयं ममैव स्यात् परस्परम् ॥ ६ ॥
भोक्ष्येऽखिलमहं चैतद्विनाऽन्यं स्तः सुवैरिणौ ।
द्वेष्टि द्विष्ट उभौ शत्रू स्तश्चैकतरसंज्ञकौ ॥ ७ ॥

**परम शत्रु और एकतरफा शत्रु भाइयों के लक्षण—**भाई के रहने पर भी 'पिता का सम्पूर्ण द्रव्य मेरा ही हो, इस दूसरे भाई का न हो, यह भाई मेरे ही अधीन रहे मैं इसके अधीन न रहूँ, और मैं इसको अलग रखकर अकेले समग्र वस्तु का उपभोग करूँगा' ऐसा जो परस्पर भाई लोग एक दूसरे के प्रति विचार रखते हैं, वे दोनों 'परमशत्रु' कहलाते हैं। जो केवल द्वेष करता है और जो किसी का द्वेषपात्र होता है वे दोनों 'एकतरफा शत्रु' कहलाते हैं।

शूरस्योत्थानशीलस्य बलनीतिमतः सदा ।
सर्वे मित्रा गूढवैरा नृपाः कालप्रतीक्षकाः ॥ ८ ॥
भवन्तीति किमाश्चर्यं राज्यलुब्धा न ते हि किम् ।
न राज्ञो विद्यते मित्रं राजा मित्रं न कस्य वै ॥ ९ ॥
प्रायः कृत्रिममित्रे ते भवतश्च परस्परम् ।
केचित् स्वभावतो मित्राः शत्रवः सन्ति सर्वदा ॥ १० ॥

राजाओं की परस्पर कृत्रिम-मित्रता का निर्देश—'जो राजा शूर, सदा उन्नति के लिये उद्योगशील एवं बल तथा नीति से युक्त होता है उसके सभी राजा लोग समय की प्रतीक्षा करनेवाले (मौका का इन्तजार करनेवाले) होकर गुप्त रूप से बैरभाव और ऊपर से मित्रभाव रखनेवाले होते हैं' इस पर आश्चर्य करना क्या उचित है ? अर्थात् कभी नहीं। क्योंकि क्या वे (राजा लोग) राज्य के लोभी नहीं हैं अर्थात् अवश्य हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि राजा का कोई मित्र नहीं होता है और राजा भी किसी के मित्र नहीं होते हैं किन्तु प्रायः वे (दोनों राजा) मतलब के लिये परस्पर कृत्रिम मित्र बने रहते हैं। और कोई स्वभावतः सदा मित्र या शत्रु ही होते हैं।

माता मातृकुलं चैव पिता तत्पितरौ तथा ।
पितृपितृव्यात्मकन्या पत्नी तत्कुलमेव च ॥ ११ ॥
पितृमात्रात्मभगिनीकन्यकासन्ततिश्च या ।
प्रजापालो गुरुश्चैव मित्राणि सहजानि हि ॥ १२ ॥