शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १६० | शुक्रनीतिः |
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से होगा ? अर्थात् कभी नहीं। क्षमा करने से जो पुण्य होता है वह क्या दण्ड देने से होगा ? अर्थात् कभी नहीं। अतः अपनी प्रजाओं को दण्ड देने से राजाओं का कैसे कल्याण होगा अर्थात् कभी नहीं, बल्कि उन सर्वो को दण्ड देने से उल्टे राजा की कीर्त्ति, धन तथा पुण्य का नाश ही होगा।
नृपस्य धर्मपूर्णत्वादण्डः कृतयुगे न हि ॥ ५६ ॥
त्रेतायुगे पूर्णदण्डः पादाधर्माः प्रजा यतः ।
द्वापरे चार्धधर्मत्वात् त्रिपादण्डो विधीयते ॥ ५७ ॥
प्रजा निःस्वा राजदौष्ट्याद् दण्डार्धं तु कलौ यथा।
सत्ययुगादि में दण्ड का अभाव एवं त्रेतादियुगों में क्रम से पूर्ण, पौन एवं अर्ध दण्ड देने का सकारण निर्देश— सत्ययुग में धर्म चारों पादों से परिपूर्ण था, अतः उस समय किसी के लिये भी दण्ड नहीं दिया जाता था, त्रेतायुग में प्रजाओं में तीन पाव ( १२ आने ) धर्म के साथ २ एक पाद ( ४ आने ) अधर्म भी रहता था, अतः उस समय पूर्ण दण्ड दिया जाता था, द्वापरयुग में आधा अंश धर्म और आधा अंश अधर्म अर्थात् दोनों समान भाव से थे, अतः तीन पादों के साथ ( १२ आने ) दण्ड का विधान था तथा कलियुग में राजाओं की दुष्टता से प्रजायें कर अधिक बढ़ जाने से एवं राजा द्वारा धन हरण करने से अत्यन्त निर्धन होती हैं अतः आधा अंश दंड देने का विधान है।
युगप्रर्वतको राजा धर्माधर्मप्रशिक्षणात् ॥ ५८ ॥
युगानां न प्रजानां न दोषः किन्तु नृपस्य हि ।
राजा को युगप्रवर्तक होने का निर्देश— प्रजाओं को धर्म तथा अधर्म की शिक्षा देनेवाला राजा के होने से वही सत्ययुग आदि ४ युगों का प्रवर्तक होता है, अतः अधर्म की प्रवृत्ति में युगों का या प्रजाओं का दोष नहीं है अर्थात् युग या प्रजाओं के ऊपर अधर्म भावना नहीं अवलम्बित है प्रत्युत राजा के ऊपर अवलम्बित है अर्थात् राजा के अधार्मिक होने से प्रजाओं में या युग में अधर्म फैलता है।
प्रसन्नो येनं नृपतिस्तदाचरति वै जनः ॥ ५६ ॥
लोभाद्भयाच्च किं तेन शिक्षितं नाचरेत् कथम् ।
धार्मिक तथा अधार्मिक प्रजाओं के होने के कारणों का निर्देश— जब कि लोभ से प्रजायें जिससे राजा प्रसन्न हो वैसा आचरण करने लगती हैं तब भला राजा के भय से उसके द्वारा सिखाये जाने पर तदनुसार कैसे नहीं वे चलेंगी -अर्थात् अवश्य चलेंगी।
सुपुण्यो यत्र नृपतिर्धर्मिष्ठास्तत्र हि प्रजाः ॥ ६० ॥
महापापी यत्र राजा तत्राधर्मपरो जनः ।