शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २६ )
है। महाभारत में सहस्रशः राजन् शब्द¹ को क्षत्रिय का पर्याय बतलाया गया है। पाणिनीय² अष्टाध्यायी के व्याख्यान के प्रसंग में भी राजन् शब्द का प्रयोग क्षत्रिय जाति के लिए किया गया है। इसका समर्थन वार्त्तिककार³ के कथन से भी होता है।
तृतीय मत के अनुसार राज्याभिषिक्त क्षत्रिय ही राजा है। अत एव मनुस्मृति में क्षत्रियों⁴ का ही यह कर्त्तव्य बतलाया गया है। विज्ञानेश्वर भी इसी मत के समर्थक⁵ हैं। मत्स्य-पुराण⁶ की भी यही सम्मति है।
चतुर्थ अर्थ में राजन् शब्द के प्रयोग का निर्देश हमें पाणिनि-सूत्र⁷ में तथा आधुनिक व्यवहार में भी मिलता है।
उपर्युक्त चार पक्षों में प्रथम पक्ष तो अत्यन्त स्थूल है। राज्य शब्द की व्युत्पत्ति जातिवाची राजन् शब्द से होती है। एवञ्च क्षत्रिय के कर्म से अतिरिक्त जाति के कर्म को राज्य कहना ही जब गौण है तब उस राज्य के अधिकारी क्षत्रियेतर जाति के लिए 'राजा' शब्द का प्रयोग मुख्य कैसे हो सकता है? प्रजा-पालनादि-स्वरूप राज्य क्षत्रिय का ही कर्म है—यह तो निर्विवाद है। अत एव मनु,⁸ याज्ञवल्क्य⁹, महाभारत¹⁰ आदि ग्रन्थों में अप्रजा- पालन को क्षत्रिय का कृत्य बतलाया गया है। महाभारत में तो एक जगह यह भी बतलाया गया है कि अपने राज्य-काल की समाप्ति के बाद भी क्षत्रिय को
१. शान्ति-पर्व—६०।२४; ६४।१९; ६३, ६४ तथा ६५ अध्यायों में तो क्षात्र-धर्म तथा राज-धर्म को बारम्बार पर्याय के रूप में निर्दिष्ट किया गया है।
२. पा० सू० ५।१।१२४, ४।१।१३७ ।
३. पा० सू० ४।१।१३७ पर वार्त्तिक—"राज्ञो जातावेवेति वक्तव्यम्" ।
४. ब्राह्मं प्राप्तेन संस्कारं क्षत्रियेण यथाविधि ।
सर्वस्यास्य यथा-न्यायं कर्त्तव्यं परिरक्षणम् ॥ म० स्मृ०.७।२ ॥
५. अभिषेकादि-गुण-युक्तस्य राज्ञः प्रजापालनं परमो धर्मः—मिताक्षरा-या० स्मृ० २।१ ॥
६. राज्ञोऽभिषिक्त-मात्रस्य किं नु कृत्यतमं भवेत् । म० पु० २१४।१
७. राजा च प्रशंसायाम्—पा० सू० ६।२।६३ ॥
८. प्रजानां रक्षणं दानमिज्याऽध्ययनमेव च ।
विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः । म० स्मृ० १।८९ ॥
९. प्रधानं क्षत्रिये कर्म प्रजानां परिपालनम् । या० स्मृ० १।११९ ॥
१० प्रजाश्च परिपालयेत् । म० भा० (शान्ति-पर्व) ६०।१४ ॥