शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 288, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें| २०२ | शुक्रनीतिः |
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अन्यायेनार्जितो यस्माद् येन तत्पापभाक् च सः।
सुपात्रतो गृहीतं यद्दत्तं वा वर्धते च यत् ॥ ५ ॥
**अन्यायोपार्जित कोष के दुष्टफलों का निर्देश—**जिसने अन्याय से धन उपार्जन किया है अतः वह उस (अन्यायोपार्जन) के पाप का फल भोगने-वाला होता है और जो धन सुपात्र से लिया जाता है या सुपात्र को दिया जाता है वह धन बढ़ता है।
स्वागमी सद्व्ययी पात्रमपात्रं विपरीतकम्।
अपात्रस्य हरेत् सर्वं धनं राजा न दोषभाक् ॥ ६ ॥
**सुपात्र तथा अपात्र के लक्षणादि का निर्देश—**जो न्याय से धन का उपार्जन करनेवाला तथा सत्कार्य में व्यय करनेवाला होता है वह 'सुपात्र' कहलाता है। इससे विपरीत अर्थात् अन्याय से धनोपार्जन तथा कुमार्ग में धन व्यय करनेवाला 'अपात्र' कहलाता है अतः यदि अपात्र के सम्पूर्ण धन को हरण करनेवाला राजा हो तो दोषभागी नहीं होता है।
अधर्मशीलनृपतेः सर्वतः संहरेद्धनम्।
छलाद् बलाद्दस्युवृत्त्या परराष्ट्राद्धरेत्तथा ॥ ७ ॥
**अधर्मशील राजा के धन को हर लेने का निर्देश—**राजा को अधर्मशील राजा के पास से सभी प्रकारों से अर्थात् चाहे छल, बल या डाकुओं की वृत्ति (डाका डालने) से धन हरण करना चाहिये। तथा इसी तरह शत्रु के राज्य से भी धनहरण करना चाहिये।
त्यक्त्वा नीतिबलं स्वीयप्रजापीडनतो धनम्।
सञ्चितं येन तत्तस्य सराज्यं शत्रुसाद्भवेत् ॥ ८ ॥
**शत्रु के अधीन राज्य होने के कारणों का निर्देश—**जिसने नीति-बल का परित्याग करके अर्थात् अन्याय से अपनी प्रजा को पीड़ा पहुँचाकर धन संचय किया है उसका वह धन राज्य के साथ साथ शत्रु के अधीन हो जाता है।
दण्डभूभागशुल्कनामाधिक्यात् कोशवर्धनम्।
अनापदि न कुर्यात् तीर्थदेवकरग्रहात् ॥ ९ ॥
**देवोत्तर संपत्ति पर कर लगाकर धन न बढ़ाने का निर्देश—**बिना विशेष आपत्ति पड़े प्रजा के ऊपर अधिक जुर्माना, मालगुजारी या चुंगी बढ़ाकर एवं तीर्थ स्थान तथा देवोत्तर संपत्ति पर कर लगाकर राजा को अपना कोश (खजाना) नहीं बढ़ाना चाहिए।
यदा शत्रुविनाशार्थं बलसंरक्षणोद्यतः।
विशिष्टदण्डशुल्कादि धनं लोकात्तदा हरेत् ॥ १० ॥
**आपत्ति में अधिक कर बढ़ाने का निर्देश—**जिस समय राजा शत्रु का