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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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चतुर्थाध्याये कोशानिरूपणप्रकरणम् २११

कृष्णं सितं क्रमाद् रक्तं पीतन्तु जरठं विदुः।
कनिष्ठं मध्यमं श्रेष्ठं क्रमाच्छुक्त्युद्भवं विदुः ॥ ६१ ॥

'कृष्ण वर्ण की मोती कनिष्ठ, श्वेतवर्ण की मध्यम, रक्तवर्ण की श्रेष्ठ तथा पीतवर्ण की पुरानी होती है' ऐसा सीप की मोती के विषय में समझना चाहिये।

तदेव हि भवेद् वेध्यमवेध्यानीतराणि तु।
कुर्वन्ति कृत्रिमं तद्वत्सिंहलद्वीपवासिनः ॥ ६२ ॥

**कृत्रिम मोती के निर्माण का स्थान—**सीप की मोती ही वेधी जा सकती है अन्य मोती नहीं वेधी जा सकती। सिंहल (सीलोन) देशवासी असली मोती के समान नकली मोती बनाते हैं।

तत्सन्देहविनाशार्थं मौक्तिकं सुपरीक्षयेत्।
उष्णे सलवणस्नेहे जले निश्युषितं हि तत् ॥ ६३ ॥
व्रीहिभिर्मर्दितं नेयाद्वैवर्ण्यं तदकृत्रिमम्।
श्रेष्ठाभं शुक्तिजं विद्यान्मध्यभां त्वितरद्विदुः ॥ ६४ ॥

**मोती की परीक्षाविधि-निर्देश—**अतः सन्देह दूर करने के लिये मोती की भलीभांति परीक्षा करनी चाहिये। परीक्षा विधि यह है कि—गर्म जल में नमक तथा तेल मिलाकर उसी में मोती को डालकर रातभर पड़ा रहने दे पश्चात् प्रातः मोती को निकाल कर धानों के बीच रख कर खूब रगड़े, इसके बाद यदि उसका रंग बदल जाय तो मोती को नकली यदि न बदले तो असली समझना चाहिये। उत्तम आभा (कान्ति) की मोती असली और मध्यम आभा की नकली समझी जाती है।

तुलाकल्पितमूल्यं स्याद्रत्नं गोमेदकं बिना।
क्षुर्माविंशतिभी रक्ती रत्नानां मौक्तिकं बिना ॥ ६५ ॥

गोमेदक रत्न को छोड़ कर शेष रत्नों का मूल्य तौल के अनुसार होता है। मोती को छोड़कर शेष रत्नों के लिये एक रत्ती २० अलसियों की मानी गई है।

रक्तित्रयं तु मुक्तायाश्चतुःकृष्णलकंर्भवेत्।
चतुर्विंशतिभिस्ताभी रत्नटङ्कस्तु रक्तिभिः ॥ ६६ ॥
टङ्कैश्चतुर्भिस्तोलः स्यात् स्वर्णविद्रुमयोः सदा।

**रत्नों का तुलामान निर्देश—**मोती के लिये ४ कृष्णलों (तौल विशेष) की ३ रत्ती, २४ रत्तियों का रत्नों के लिये १ टङ्क होता है। स्वर्ण तथा मूंगा तौलने के लिये ४ टङ्कों का १ तोला होता है।

एकस्यैव हि वज्रस्य त्वेकरक्तिमितस्य च ॥ ६७ ॥
सुविस्तृतदलस्यैव मूल्यं पञ्चसुवर्णकम्।