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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 304

२१८ | शुक्रनीतिः

अपने राज्य में राजा कभी भी छल से बारंबार किसी वस्तु की चुंगी न लेवे। और राजा बेचने या खरीदनेवालों से वस्तु के मूल्य का ३२ वां अंश चुंगी के रूप में ग्रहण करे अथवा मूल धन को छोड़कर लाभ में से बीसवां या सोलहवां अंश चुंगी लेवे। जिस विक्रेता (बेचनेवाले) को मूल धन से कम या बराबर मूल्य वस्तु का मिले, उससे चुंगी न लेवे। और राजा थोड़े मूल्य से अधिक द्रव्य का लाभ देखकर तदनुसार ही खरीदनेवाले से चुंगी सदा लेवे।

बहुमध्याल्पफलितां भुवं मानमितां सदा ॥ १०८ ॥
ज्ञात्वा पूर्वं भागमिच्छुः पश्चाद्भागं विकल्पयेत् ।
हरेच्च कर्षकाद्भागं यथा नष्टो भवेन्न सः ॥ १०६ ॥

किसान से भाग (मालगुजारी) लेने का प्रमाण— सदा करग्रहण का अभिलाषी राजा प्रथम भूमि को नाप कर और उसके बहुत, मध्यम वा कम पैदावार को समझ कर पश्चात तदनुसार कर का निश्चय करे। और कृषक से उतना ही कर लेवे जितने से वह नष्ट (क्षतिग्रस्त) न होवे।

मालाकार इव ग्राह्यो भागो नाङ्गारकारवत् ।
बहुमध्याल्पफलतस्तारतम्यं विमृश्य च ॥ ११० ॥

माली जैसे लता आदि से थोड़ा २ फूल चुनता है उसी भांति राजा भी थोड़ा कर लेवे किन्तु जैसे कोयला बनानेवाला संपूर्ण वृक्षों के जड़ को जलाकर कोयला बनाता है वैसा संपूर्ण कर रूप में न ले लेवे। और बहुत, मध्यम तथा कम पैदावार के तारतम्य को समझ कर तदनुसार ही कर लेवे।

राजभागादि व्ययतो द्विगुणं लभ्यते यतः ।
कृषिकृत्यं तु तच्छ्रेष्ठं तन्न्यूनं दुःखदं नृणाम् ॥ १११ ॥

उत्तम कृषिकृत्य के लक्षण— राजा का कर (मालगुजारी) आदि संपूर्ण व्यय को काट-कर जिस खेती से दुगुना लाभ हो, वह उत्तम खेती कहलाती है इससे कम लाभ होने पर कृषकों को दुःख देनेवाली खेती हो जाती है।

तडागवापिकाकूपमातृकाद्देवमातृकात् ।
देशान्नदीमातृकात्तु राजाऽनुक्रमतः सदा ॥ ११२ ॥
तृतीयांशं चतुर्थांशमर्धांशं तु हरेत्फलम् ।
षष्ठांशमूषरात्तद्वत्पाषाणादिसमाकुलात् ॥ ११३ ॥

तडागादिकों से संपन्न भूमि से ग्राह्य राजभाग का तारतम्य-निर्देश— राजा क्रमानुसार सदा तडाग (तालाब), बावली या कूप के जल से सींचे जानेवाले खेतों से तृतीयांश, वर्षा के द्वारा सिंचाई होनेवाले खेतों से चतुर्थांश तथा नदी से सिंचाई होनेवाले खेतों से उपज का आधा अंश एवं बंजर तथा पथरीली जमीन से होनेवाले आय का छठा अंश कर रूप में ग्रहण करे।