शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 310, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें| २२४ | शुक्रनीतिः |
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सद्रक्षणं दुष्टनाशः स्वांशादानं तु क्षत्रिये ।
कृषिगोगुप्तिवाणिज्यमधिकं तु विशां स्मृतम् ॥ १७ ॥
**क्षत्रिय और वैश्य के कर्मों का निर्देश—**सज्जनों की रक्षा करना, दुष्टों का नाश करना, अपने अंश (कर) को ग्रहण करना ये ३ कर्म क्षत्रियों के जीविका के लिये अधिक हैं। खेती करना, गोपालन तथा वाणिज्य करना ये ३ कर्म जीविकार्थ वैश्यों के लिये अधिक हैं।
दानं सेवैव शूद्रादेर्नीचकर्म प्रकीर्तितम् ।
क्रियाभेदैस्तु सर्वेषां भृतिवृत्तिरनिन्दिता ॥ १८ ॥
**शूद्रादि के कर्मों का निर्देश—**दान देना, जीविकार्थ नौकरी करना तथा नीच कर्म (चौका-बर्त्तन आदि) करना शूद्रादि के ये कर्म हैं। क्रियाओं में भेद द्वारा सभी वर्णों की भरण-पोषणार्थ वृत्ति अनिन्दित मानी गई है।
सीरभेदैः कृषिः प्रोक्ता मन्वाद्यैर्ब्राह्मणादिषु ।
ब्राह्मणैः षोडशगवं चतुरूनं यथा परैः ॥ १६ ॥
द्विगवं वाऽन्त्यजैः सीरं दृष्ट्वा भूमार्दवं तथा ।
**ब्राह्मणादि के लिये कृषि-भेद का निर्देश—**जैसे मनु आदि स्मृतिकारों ने हलसम्बन्धी भेदों के द्वारा ब्राह्मणादि के लिये भी कृषि करने का विधान बताया है। उसमें ब्राह्मणों को १६ बैल १ हल पर रख कर खेत जुतवाना चाहिये, और उत्तरोत्तर ४-४ कम बैलों से अर्थात् क्षत्रियों को १२ बैल, वैश्यों को ८ बैल तथा शूद्रों को ४ बैल १ हल पर रखते हुये खेत जुतवाना चाहिये। और अन्त्यजों (अस्पृश्य जातियों) को २ बैल १ हल पर रखना चाहिये। यह नियम भूमि की मृदुता को देखकर किया गया है अतः यदि कठिन भूमि हो तो बैलों की संख्या २ से ४ भी हो सकती है।
ब्राह्मणेन विनाऽन्येषां भिक्षावृत्तिर्विगर्हिता ॥ २० ॥
**ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य को भिक्षा निन्दित होने का निर्देश—**ब्राह्मणों को छोड़ कर अन्य वर्णों के लिये भिक्षा मांग कर जीविका चलाना विशेष रूप से निन्दित है।
तपोविशेषैर्विविधैर्व्रतैश्च विधिचोदितैः ।
वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना ॥ २१ ॥
**द्विजाति को साङ्गवेद पढ़ने का निर्देश—**द्विजों को वेद-विहित नाना प्रकार की तपस्यायें तथा व्रत करते हुये उपनिषदों के सहित सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन करना चाहिये।
योऽधीतविद्यः सकलः स सर्वेषां गुरुर्भवेत् ।
न च जात्याऽनधीती यो गुरुर्भवितुमर्हति ॥ २२ ॥