शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 320, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें२३४ | शुक्रनीतिः
करना, अत्यन्त भीषण बाहु प्रहार करना, शत्रु के ऊपर लगातार बाहुप्रहार करना, और बाहुप्रहार से चोट पहुँचाना तथा असावधान होने पर शत्रु को बाहुओं से मसल डालना इत्यादि रीतियों से किये हुये बाहुयुद्ध को 'निपीड़न' कहते हैं। इससे अपने को बचा लेने को 'प्रतिक्रिया' कहते हैं। ये सब बाहुयुद्ध की कला के अन्दर ही माने जाते हैं।
कलाऽभिलक्षिते देशे यन्त्राद्यस्त्रनिपातनम्।
वाद्यसङ्केततो व्यूहरचनादि कला स्मृता ॥८१॥
२०. लक्ष्य के स्थान पर युद्ध-यन्त्रादि तथा अस्त्रों को फेंकना (निशाना लगाकर अस्त्र चलाना) भी कला है। २१. युद्ध के बाजों के संकेत से व्यूहरचना आदि करना भी कला है।
गजाश्वरथगत्या तु युद्धसंयोजनं कला।
कलापञ्चकमेतद्धि धनुर्वेदागमे स्थितम् ॥८२॥
२२. हाथियों, घोड़ों तथा रथों को विशेष रूप से चलाने के द्वारा युद्ध का आयोजन करना भी कला है। ये पांच कलायें धनुर्वेद शास्त्र में कही हुई हैं।
विविधासनमुद्राभिर्देवतातोषणं कला।
सारथ्यं च गजाश्वादेर्गतिशिक्षा कला•स्मृता ॥८३॥
पृथक् ४ कलाओं के लक्षण—२३. अनेक प्रकार के पद्मासनादि आसनों तथा मत्स्य-कूर्मादि मुद्राओं द्वारा देवता को संतुष्ट करना भी कला है। २४. रथ हांकने को एवं २५. हाथी तथा घोड़े को चाल सिखाने को भी कला कहते हैं।
मृत्तिकाकाष्ठपाषाणधातुभाण्डादिसत्क्रिया ।
पृथक्कलाचतुष्कन्तु चित्राद्यालेखनं कला ॥८४॥
२६-२९. मिट्टी, काष्ठ, पत्थर तथा धातु के वर्त्तन आदि को सुन्दर रीति से बनाना ये भी पृथक् २ चार कलायें हैं। ३०. चित्र आदि का सुन्दर लिखना भी कला है।
तडागवापीप्रासादसमभूमिक्रिया कला ।
घट्याद्यनेकयन्त्राणां वाद्यानां तु कृतिः कला ॥८५॥
तडागकूपादि कलाओं के लक्षण—३१. तालाब, बावड़ी, राजभवन तथा भूमि को समतल बनाने की क्रिया भी कला है। ३२. घड़ी आदि अनेक यन्त्रों को बनाना भी कला है। ३३. और अनेक प्रकार के बाजों को बनाना भी कला है।
हीनमध्यादिसंयोग-वर्णाद्यै रञ्जनं कला।
जलवाय्वग्निसंयोगनिरोधैश्च क्रिया कला ॥८६॥