भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 328, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 328

२४२ | शुक्रनीतिः

विसृज्य धनसर्वस्वं भर्ता वै शरणं स्त्रियः ।

**पति के समान अन्य स्वामी और पति-सेवा समान अन्य सुख का निषेध—**पति के समान कोई दूसरा स्वामी नहीं है, पति का साथ या उसकी सेवा के समान कोई सुख नहीं है क्योंकि धन तथा सम्पूर्ण वस्तु का परित्याग करके रहनेवाली स्त्री का केवल पति ही आश्रय होता है ।

मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः ॥ ३२ ॥
अमितस्य प्रदातारं भर्तारं का न पूजयेत् ।

और पिता, भाई और पुत्र ये सब परिमित सुख देनेवाले होते हैं अतः अपरिमित सुख देनेवाले अपने पति की कौन स्त्री नहीं पूजन करे अर्थात् सभी को पूजन करना चाहिये ।

शूद्रो वर्णश्चतुर्थोऽपि वर्णत्वाद्धर्ममर्हति ॥ ३३ ॥
वेदमन्त्रस्वधास्वाहा-वषट्कारादिभिर्विना ।
पुराणोयुक्तमन्त्रैश्च नमोऽन्तैः कर्म केवलम् ॥ ३४ ॥

**शूद्र-धर्म का निर्देश—**शूद्र भी चौथा वर्ण कहा जाता है अतः वर्ण होने से उसे भी धर्म करना उचित है । अत एव वह वेदमन्त्र, स्वाहा, स्वधा तथा वषट्कार आदि का उच्चारण न करके केवल पुराणोक्त मन्त्रों से अन्त में 'नमः' पद जोड़ कर कर्म करने के योग्य होता है ।

विप्रवद्विप्रभिन्नासु क्षत्रभिन्नासु क्षत्रवत् ।
प्रजाताः कर्म कुर्युर्वै वैश्यभिन्नासु वैश्यवत् ॥ ३५ ॥

**संकर जाति के नियम का निर्देश—**ब्राह्मण की विवाहिता स्त्री में उत्पन्न हुये लोगों को ब्राह्मण की भांति, क्षत्रिय की विवाहिता स्त्री में उत्पन्न हुये लोगों को क्षत्रिय की भांति, वैश्य की विवाहिता स्त्री में उत्पन्न हुये लोगों को वैश्य की भांति कर्म करना चाहिये ।

वैश्यासु क्षत्रविप्राभ्यां जातः शूद्रासु शूद्रवत् ।
अधमादुत्तमायां तु जातः शूद्राधमः स्मृतः ॥ ३६ ॥
स शूद्रादनु सत्कुर्यान्नाममन्त्रेण सर्वदा ।

ब्राह्मण या क्षत्रिय से वैश्य या शूद्र जाति की स्त्री में उत्पन्न हुआ शूद्र के तुल्य कर्म करे । अधम से उत्तम वर्ण की स्त्री में उत्पन्न हुआ शूद्राधम कहा हुआ है । अतः वह शूद्र से हीन होने से मन्त्र के स्थान पर केवल नाम लेकर उसी से सदा सत्कर्म करे ।

ससङ्करचतुर्वर्णा एकत्रैकत्र यावनाः ॥ ३७ ॥
वेदभिन्नप्रमाणास्ते प्रत्यगुत्तरवासिनः ।

एक तरफ सङ्कीर्णजातियों के साथ ब्राह्मणादि चारो वर्ण रहते हैं और एक