शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४७
तद्दान्यानि तज्जातिगृहपङ्क्तिमुखे न्यसेत् ।
जात्यनुकूल पूज्य देव तथा गुरु के गृह बनाने के स्थान का निर्देश— जिस जाति के जो पूज्य देवता हों और उनको विद्या पढ़ानेवाले जो गुरु हों उनके गृह उस जाति के लोगों के मकानों की पंक्ति के संमुख बनाने चाहिये ।
शृङ्गाटके ग्राममध्ये विष्णोर्वा शंकरस्य च ॥ ६६ ॥
गणेशस्य रवेर्देव्याः प्रासादान् क्रमशोऽन्यसेत् ।
ग्राम के चौराहे पर विष्णु आदि के मन्दिर बनाने का निर्देश— गांव के चौराहे या गांव के मध्य में विष्णु, शंकर, गणेश, सूर्य तथा देवी इन पञ्चदेवों के मन्दिर क्रमशः बनाने चाहिये ।
मेर्वादिषोडशविधलक्षणान् सुमनोहरान् ॥ ६७ ॥
वर्तुलांश्चतुरस्रान् वा यन्त्राकारान् समण्डपान् ।
प्राकारगोपुरगणयुतान् द्वित्रिगुणोच्छ्रितान् ॥ ६८ ॥
यथोक्तान्तःसुप्रतिमाञ्जलमूलान् विचित्रितान् ।
मेरु आदि मन्दिर के १६ प्रकारों का सलक्षण निर्देश— जो मन्दिर मेरु आदि १६ प्रकार के लक्षणों से युक्त, अत्यन्त मनोहर, गोलाकार, चौकोर या यन्त्राकार से युक्त, मण्डप, प्राकार ( परकोटा ) तथा प्रधान विशाल द्वारों से युक्त, परिचारक वर्गों से युक्त, लम्बाई-चौड़ाई से दुगुना या तिगुने ऊंचे हों और जिनके मध्य में शास्त्रोक्त रीति से बनी हुई सुन्दर देवमूर्त्तियां रखी हों । एवं जिनके चारों ओर खाइयों में जल भरा हो तथा जिनमें नाना प्रकार के चित्र बने हों ।
रम्यः सहस्रशिखरः सपादशतभूमिकः ॥ ६६ ॥
सहस्रहस्तविस्तार उच्छ्रायः स्यान्मेरुसंज्ञकः ।
जिस मन्दिर में १ हजार कंगूरे बने हों और १२५ पगभूमि हो, तथा जिसका १ हजार हाथ का विस्तार तथा ऊंचाई हो, वह मेरु संज्ञक होता है ।
ततस्ततोऽष्टांशहीना अपरे मन्दरादयः ॥ ७० ॥
मन्दरो ऋक्षमाली च द्युमणिश्चन्द्रशेखरः ।
माल्यवान् पारियात्रश्च रत्नशीर्षश्च धातुमान् ॥ ७१ ॥
पद्मकोशः पुष्पहासः श्रीकरः स्वस्तिकाभिधः ।
महापद्मः पद्मकूटः षोडशो विजयाभिधः ॥ ७२ ॥
इससे उत्तरोत्तर अष्टांश हीन अन्य मन्दर आदि नामवाले मन्दिर होते हैं। जिनके नाम क्रम से २. मन्दर, ३. ऋक्षमाली, ४. द्युमणि, ५. चन्द्रशेखर, ६. माल्यवान्, ७. पारियात्र, ८. रत्नशीर्ष, ९. धातुमान्, १०. पद्मकोश,