शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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अकुशलता के ऊपर ही कृत-युग तथा कलियुग निर्भर हैं, इनकी कोई निश्चित अवधि नहीं है। फिर कृत-युग में राजा की कोई आवश्यकता नहीं थी—इस कथन का क्या अर्थ है ? वसुमना तथा¹ बृहस्पति के सम्वाद से भी उपर्युक्त कथन की ही पुष्टि होती है। शुक्र-नीति-सार में भी राजा को ही युग-प्रवर्त्तक² माना गया है। मनु भी जब यह कहते हैं कि स्वभावतः सत्पथ-प्रवृत्त³ मनुष्य दुर्लभ है तो इससे यही मत परिपुष्ट होता है कि राजा के दण्ड-प्रयोग-नैपुण्य से ही प्रजा में सम्पूर्ण रूप से सत्पथ-प्रवृत्ति हुई है न कि किसी युग-विशेष का धर्म-स्थापन में कोई मूल्य है। मनु की व्याख्या में कुल्लूक भट्ट द्वारा उद्धृत एक श्रुति-वाक्य से⁴ भी यह सिद्ध होता है कि मनुष्य मूलतः सर्व-दोष-विनिर्मुक्त नहीं था। राज्य का अधिकारी क्षत्रिय है, जैसा पहले बतलाया जा चुका है, और 'पुरुष-सूक्त' में वर्णित क्षत्रिय की उत्पत्ति से भी कुछ अस्पष्ट समर्थन इस मतको मिलता है। 'प्रजापति' की भावना में भी राजा की ही भावना निहित है। यह दूसरी बात है कि राजा तथा 'प्रजापति' के कर्त्तव्यों में कुछ तारतम्य हो, परन्तु इतना तो स्पष्ट ही है कि 'प्रजापति' के वैदिक सिद्धान्त का 'राजा' के साथ घनिष्ठ-सम्बन्ध है। इस तथ्य से भी यही प्रमाणित होता है कि किसी न किसी रूप में सृष्टि के प्रारम्भ से ही राजा की अनुवृत्ति होती आ रही है। फिर भी कृत-युग में जो राजा या दण्ड आदि की सत्ता का प्रतिषेध किया गया है उसका तात्पर्य इतना ही प्रतीत हो रहा है कि दण्ड-प्रयोग के द्वारा प्रजा को सुव्यवस्थित कर दिए जाने पर राजा की मुख्य कृत्य—दण्ड-प्रयोग—से जो निवृत्ति हो जाती है इसी लिए यह अर्थ-वाद मात्र है कि राजा या दण्ड आदि की सत्ता कृत-युग में नहीं थी। किन्तु यह तो कथमपि नहीं कहा जा सकता कि कृत-युग में धर्म ही धर्म स्वभावतः प्रसृत था और राजा की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। इसका एक बहुत ही
राजा कृत-युग-स्रष्टा त्रेताया द्वापरस्य च ।
युगस्य च चतुर्थस्य राजा भवति कारणम् ॥
शान्ति-पर्व–६९।८०, ८७, ८९, ९१, ९८ ॥
इस प्रसङ्ग में शा० प० ९१।६, १४१।९-१०, उद्योग-पर्व १३२।१६ आदि श्लोक भी द्रष्टव्य हैं।
१. शान्ति-पर्व ६८।६–३६ ॥
२. शु० नी० सा० ४।५५ ॥
३. म० स्मृ० ७।२२ ॥
४. 'सत्यवाचो देवा अनृत-वाचो मनुष्याः'। कुल्लूक भट्ट–म० स्मृ० १।२९ ॥