भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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२६० शुक्रनीतिः

वराभयाब्जशङ्खाढ्यहस्ता विष्णोश्च सात्त्विकी ॥ १४८॥
मृगबाणाभयवर-हस्ता सोमस्य सात्त्विकी ।
**सात्त्विक प्रतिमाओं का वर्णन—**विष्णु की जिस मूर्त्ति में क्रम से वर तथा अभयदान की मुद्रा एवं कमल तथा शङ्ख से युक्त चारों हाथ होते हैं वह 'सात्त्विक' कहलाती है । मृग, बाण, अभय तथा वरदान की मुद्रा क्रम से चारों हाथों में जिसके रहती है वह चन्द्रमा की 'सात्त्विक मूर्त्ति' कहलाती है ।

वराभयाब्जलड्डुक-हस्तेभास्यस्य सात्त्विकी ॥ १४९॥
पद्ममालाऽभयवर-करा सत्त्वाधिका रवेः ।
गणेश की जो सात्त्विक मूर्त्ति होती है उसके चारों हाथों में क्रम से वर तथा अभय दान की मुद्रा एवं कमल तथा लड्डू होते हैं । सूर्य की जो सात्त्विक मूर्त्ति होती है उसके चारों हाथों में क्रम से कमल, माला, अभय तथा वरदान की मुद्रा होती है ।

वीणालुङ्गाभयवर-करा सत्त्वगुणा श्रियः ॥ १५०॥
लक्ष्मी की सात्त्विक मूर्त्ति में चारों हाथों में क्रम से वीणा, लुङ्ग, अभय तथा वरदान मुद्रा होती है ।

शङ्खचक्रगदापद्मैरायुधैरादितः पृथक् ।
षट्षड्भेदाश्च मूर्तीनां विष्ण्वादीनां भवन्ति हि ॥ १५१ ॥
विष्णु आदि देवताओं की मूर्त्तियों के प्रथम से लेकर चतुर्थ पर्यन्त चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा, पद्म और आयुधों के धारण करने में भिन्नता होने से ६-६ भेद होते हैं ।

यथोपाधिप्रभेदेन ससंयोगविभागतः ।
समस्तव्‍यस्तवर्णादिभेदज्ञानं प्रजायते ॥ १५२ ॥
मूर्त्तियों की जैसी उपाधि (नाम) है उसके अनुसार भेद होने से और वाहन तथा अक्षादियों के संयोग तथा पृथक्ता होने से, समस्त तथा पृथक् पृथक् रूप से वर्णादियों का भेद ज्ञात होता है ।

लेख्या लेप्या सैकती च मृन्मया पैष्टिकी तथा ।
एतासां लक्षणाभावे न कश्चिद्दोष ईरितः ॥ १५३॥
**लक्षणों के अभाव में भी दोषरहित प्रतिमा का निर्देश—**चित्र, लेप, बालू, मिट्टी, तथा चूर्ण-चावल आदि के चूर्ण की पिष्टि (पीठी) के द्वारा बनी हुई इन मूर्त्तियों में शास्त्रानुसार सिद्ध किसी लक्षण की न्यूनता होने पर भी कोई इसमें दोष नहीं मानते हैं अर्थात् यथारुचि बनाई जा सकती हैं ।

बाणलिङ्गे स्वयम्भूते चन्द्रकान्तसमुद्भवे ।
रत्नजे गण्डकोद्भूते मानदोषो न सर्वथा ॥ १५४ ॥