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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 526 में से

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पृष्ठ 36

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किम्वा 'दण्ड-नीति'¹। महाभारत में ही अन्यत्र² ब्रह्म-प्रणीत नीति-शास्त्र के प्रचारक के रूप में स्वायम्भुव मनु का भी नाम आया है और इसी मानव-शास्त्र के आधार पर उशना तथा बृहस्पति के द्वारा अपने-अपने शास्त्र का प्रणयन किए जाने का उल्लेख है। शुक्र-नीति-सार के अनुसार इस ब्रह्म-प्रणीत 'नीति-शास्त्र' में एक करोड़³ श्लोक थे। परन्तु प्रजा की आयु में ह्रास को देखकर भगवान् शङ्कर ने उस 'नीति-शास्त्र' को दश हजार अध्यायों में संक्षिप्त किया।

इस संक्षिप्त शास्त्र का नाम भगवान् शङ्कर के पर्याय 'विशालाक्ष' के आधार पर 'वैशालाक्ष नीति-शास्त्र'⁴ पड़ा। पुनः इन्द्र ने उस वैशालाक्ष शास्त्र को ५ हजार अध्यायों में संक्षिप्त किया और उसका नाम पड़ा 'बाहुदन्तक-शास्त्र'⁵। तत्पश्चात् बृहस्पति ने तीन हजार अध्यायों में उस 'बाहुदन्तक-शास्त्र' का सार निकाला जिसका नाम 'बार्हस्पत्य⁶ शास्त्र' पड़ा। परन्तु सर्वान्त में महान् शुक्राचार्य ने एक हजार⁷ अध्यायों में उसका संक्षिप्त रूप प्रस्तुत किया। शुक्र-नीति-सार के विवरण के अनुसार इस शुक्र-कृत,संक्षिप्त शास्त्र में केवल २२००⁸ श्लोक थे। वे २२०० श्लोक सम्पाद्यमान शुक्र-नीति-सार में वर्त्तमान हैं, यद्यपि


१. दण्डेन नीयते चेदं दण्डं नयति वा पुनः ।
दण्ड-नीतिरिति ख्याता त्रींल्लोकानभिवर्तते ॥ शा० प० ५९।७८ ॥
२. शा० प० ३३६।३८-४६ ॥
३. शतलक्ष-श्लोक-मितं नीति-शास्त्रमयोक्तवान् ।
स्वयम्भूभगवान्लोक-हितार्थं संग्रहेण वै ॥ शु० नी० सा० १।२,३ ॥
४. प्रजानामायुषो ह्रासं विज्ञाय भगवान् शिवः ।
संचिक्षेप ततः शास्त्रम् महास्त्रं ब्रह्मणा कृतम् ॥
'वैशालाक्ष' मिति प्रोक्तं तदिन्द्रः प्रत्यपद्यत ।
दशाध्याय-सहस्राणि सुब्रह्मण्यो महातपाः ॥ शा० प० ५९।८१-८२ ॥
५. भगवानपि तच्छास्त्रं संचिक्षेप पुरन्दरः ।
सहस्रैः पञ्चभिस्तात यदुक्तं बाहुदन्तकम् ॥ वही ५९।८३ ॥
६. अध्यायानां सहस्रैस्तु त्रिभिरेव बृहस्पतिः ।
संचिक्षेपेश्वरो बुद्ध्या बार्हस्पत्यं तदुच्यते ॥ वही ५९।८४ ॥
७ अध्यायानां सहस्रेण काव्यः संक्षेपमब्रवीत् ॥ वही ५९।८५ ॥
८. मन्वाद्यैराहतो योऽर्थस्तदर्थो भार्गवेण वै ।
द्वा-विंशति-शतं श्लोका नीति-सारे प्रकीर्त्तिताः ॥
शु० नी० सा० ४।१२४१-४२ ॥

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