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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७५

किये हुये जूरी ), ३. स्मृति ( धर्मशास्त्र ), ४. गणक ( गणना करनेवाला ), ५. लेखक ( लिखनेवाला ), ६. सुवर्ण, ७. अग्नि, ८. जल, ९. धन, १०. पुरुष ( कर्मचारी ), ये १० व्यवहार ( मुकद्दमा ) निर्णय करने में साधन के अङ्ग हैं।

एतद्दशाङ्गकरणं यस्यामध्यास्य पार्थिवः ॥ ३७ ॥ न्यायान् पश्येत् कृतमतिः सा सभाऽध्वरसन्निभा ।

**यज्ञतुल्य सभा के द्वितीय लक्षण का निर्देश—**इस प्रकार से परिमार्जित बुद्धिवाला राजा जिस सभा में उपर्युक्त १० साधनों का आश्रय लेकर न्याय ( मुकद्दमों ) को देखता है ( निर्णय करता है ) उसे यज्ञ-सभा के समान समझना चाहिये।

दशानामपि चैतेषां कर्म प्रोक्तं पृथक् पृथक् ॥ ३८ ॥ वक्ताऽध्यक्षो नृपः शास्ता सभ्याः कार्य्यपरीक्षकाः । स्मृतिर्विनिर्णयं ब्रूते जयं दानं दमं तथा ॥ ३९ ॥

**दशाङ्गों के कर्मों का पृथक् २ निर्देश—**पूर्वोक्त इन १० साधनों के कर्म भी पृथक् २ कहे हुये हैं। जैसे—१. अध्यक्ष ( अधिकारी पुरुष ) विवाद-निर्णय का प्रकाशक होता है एवं २. राजा—शासन करनेवाला, ३. सभ्यगण ( जूरीगण )—निर्णय के औचित्य की परीक्षा करनेवाले होते हैं और ४. स्मृति ( मन्वादिस्मृति )—इसके द्वारा विवाद का निर्णय, मन्त्र जप, दान तथा इन्द्रियादि-निग्रह का ज्ञान होता है।

शपथार्थे हिरण्याग्नी अम्बु तृषितक्षुब्धयोः । गणको गणयेदर्थं लिखेन्न्याय्यं च लेखकः ॥ ४० ॥

५-६. शपथ ग्रहण करने के लिये सोना तथा अग्नि, ७. जल—इसका प्रयोग प्यासे तथा क्रोधी के लिये होता है ८. गणक—यह विवाद की शुभा-शुभ की गणना करनेवाला होता है। ९. लेखक—न्याय-संगत विषयों का लिखनेवाला होता है।

शब्दाभिधानतत्त्वज्ञौ गणनाकुशलौ शुची । नानालिपिज्ञौ कर्त्तव्यौ राज्ञा गणकलेखकौ ॥ ४१ ॥

**गणक तथा लेखक के लक्षण—**शब्द तथा अर्थ के तत्त्वज्ञ, गणना करने में कुशल, निर्दोष, नाना प्रकार की लिपियों के ज्ञाता ऐसे लक्षणों से युक्त गणक तथा लेखक की नियुक्ति राजा करे।

धर्मशास्त्रानुसारेण ह्यर्थशास्त्रविवेचनम् । यत्राधिक्रियते स्थाने धर्माधिकरणं हि तत् ॥ ४२ ॥

**धर्माधिकरण के लक्षण का निर्देश—**जिस स्थान पर धर्मशास्त्र के अनुसार