शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 364, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें२७८ | शुक्रनीतिः
यथासत्यं चिन्तयित्वा लिखित्वा वा समाहितः।
नत्वा वा प्राञ्जलिः प्रह्वो ह्यर्थी कार्यं निवेदयेत्॥ ५६॥
**राजा के समक्ष कार्य निवेदन करने के प्रकार का निर्देश—**न्यायासन पर मन्त्रियों के साथ बैठे हुये राजा को देखकर प्रार्थी उनके पास जावे। और जाकर अधर्म से रहित जो निवेदन करना हो उसे यथार्थ रूप से विचार कर और सावधान-चित्त से उसे लिखकर नमस्कार करते हुये हाथ जोड़ कर नम्रता के साथ कार्य का निवेदन करे (दावा दाखिल करे)।
यथार्हमेनमभ्यर्च्य ब्राह्मणैः सह पार्थिवः।
सान्त्वेन प्रशमय्यादौ स्वधर्मं प्रतिपादयेत्॥ ५७॥
**अर्थी के लिये राजा के कार्यों का निर्देश—**ब्राह्मणों के साथ राजा उक्त प्रार्थी का यथायोग्य संमान कर और सर्वप्रथम सान्त्वनासूचक शब्दों से सान्त्वना देकर स्वधर्म-पालन (मुकदमा देखना) प्रारम्भ करे।
काले कार्यार्थिनं पृच्छेत् प्रणतं पुरतः स्थितम्।
किं कार्यं क्व च ते पीडा मा भैषीर्ब्रूहि मानव॥ ५८॥
केन कस्मिन् कदा कस्मात् पीडितोऽसि दुरात्मना।
एवं पृष्ट्वा स्वभावोक्तं तस्य संशृणुयाद्वचः॥ ५९॥
समयानुसार राजा विनम्रभाव से संमुख में स्थित उस कार्यार्थी (मुकदमा दायर करनेवाले) से "हे भला आदमी! तुम्हारा क्या कार्य है? क्या कष्ट है? मत डरो! मुझसे कहो! तुम्हें किस दुरात्मा ने कहाँ पर, किस समय, क्यों पीड़ा पहुँचाई है?" इस प्रकार से पूछ कर उसके स्वाभाविक रीति से कहे हुये वचन को सुने।
प्रसिद्धलिपिभाषाभिस्तदुक्तं लेखको लिखेत्।
**लेखक के कृत्यों का वर्णन—**और लेखक उसके कहे हुये वाक्यों को उस समय की लिपि और भाषा में लिखे।
अन्यदुक्तं लिखेदन्योऽर्थिप्रत्यर्थिनां वचः॥ ६०॥
चौरवत् त्रासयेद् राजा लेखकं द्रागतन्द्रितः।
**राजा को अन्यथा लेख लिखनेवाले को दण्ड देने का निर्देश—**और यदि कोई लेखक वादी-प्रतिवादी के कहे हुये वचन को जैसा वह कहता है वैसा नहीं लिखे 'अर्थात् भिन्न रीति से लिखे' तो राजा उसे अविलम्ब चोर की भांति दण्ड देने में तत्परता रक्खे।
लिखितं तादृशं सभ्या न बिब्रूयुः कदाचन॥ ६१॥
बलाद् गृह्णन्ति लिखितं दण्डयेत्तांस्तु चौरवत्।
और सभ्य (जूरी) लोग भी उक्त रीति से लिखे हुये (अन्यथा) लेख