भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 373

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २८७

यः कश्चित्कारयेत् किञ्चिन्नियोगाद् येन केनचित् ॥ १११ ॥
तत्तेनैव कृतं ज्ञेयमनिवर्त्यं हि तत्स्मृतम् ।
**जिस किसी से कार्य करा लेने पर वह उसी का किया समझने का निर्देश—**यदि कोई किसी को अपना प्रतिनिधि बनाकर उससे जो कुछ कार्य करा ले तो वह उसी का ही किया हुआ समझना चाहिये । और उसे पलटा नहीं जा सकता है ।

नियोगितस्यापि भृतिं विवादात् षोडशांशिकीम् ॥ ११२ ॥
विंशत्यंशां तदर्धां वा तदर्धां च तदर्धिकाम् ।
यथा द्रव्याधिकं कार्यं हीना हीना भृतिस्तथा ॥ ११३ ॥
यदि बहुनियोगी स्यादन्यथा तस्य पोषणम् ।
धर्मज्ञो व्यवहारज्ञो नियोक्तव्योऽन्यथा न हि ॥ ११४ ॥
अन्यथा भृतिगृह्णन्तं दण्डयेच्च नियोगिनम् ।
**नियोजित पुरुष को १६ वां भाग भृति ( फीस ) देने एवं अन्यथा फीस ग्रहण करनेवाले को दण्ड देने का निर्देश—**नियुक्त किये हुये वकील आदि की फीस मुकदमे की हैसियत से १६ वें हिस्से के बराबर या बीसवें, दशवें, पाँचवें या ढ़ाईवें हिस्से के बराबर होनी चाहिये । यदि बहुत से नियोगी हों तो जैसा अधिक द्रव्य हो उसके अनुसार कम कम करके फीस दे । अन्यथा फीस देने की शक्ति न हो तो उसका पालन-पोषण करना चाहिये । और धर्म तथा व्यवहार को जाननेवाला व्यक्ति नियुक्त करना चाहिये अन्यथा नहीं करना चाहिये । यदि इससे अधिक फीस कोई मांगता है तो वह दण्डनीय होता है ।

कार्यो नित्यं नियोगी च नृपेण स्वमनीषया ॥ ११५ ॥
लोभेन त्वन्यथा कुर्वन् नियोगी दण्डमर्हति ।
यो न भ्राता न च पिता न पुत्रो न नियोगकृत् ॥ ११६ ॥
परार्थवादी दण्ड्यः स्याद् व्यवहारेषु विब्रुवन् ।
**राजा को अपनी बुद्धि से नियोगी करने का और नियोगी का लोभ से अन्यथा करने पर दण्डयोग्य होने का एवं भ्राता आदि न होने पर कुछ कहने पर दण्ड योग्य होने का निर्देश—**राजा अपनी बुद्धि से विचार कर सदा नियोगी पुरुष को नियुक्त करे । यदि नियोगी पुरुष लोभ से अन्यथा करे तो वह दण्डनीय होता है । जो भाई, पिता, पुत्र या नियोगी पुरुष ( वकील आदि ) न होकर दूसरे के लिये कुछ कहता है या व्यवहार में अन्यथा ( विपरीत ) बात करता है वह दण्डनीय होता है ।

तदधीनकुटुम्बिन्यः स्वैरिण्यो गणिकाश्च याः ॥ ११७ ॥
निष्कुला याश्च पतितास्तासामाह्वानमिष्यते ।