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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 377

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६१

अन्यपक्षाश्रयाद्वादी हीनो दण्ड्यश्च स स्मृतः ॥ १३६ ॥

दण्डनीय वादी के लक्षण— जो वादी जिस कार्य को सुनाकर पुनः उसे छोड़ दे और उसके विरुद्ध पक्ष का आश्रय लेकर दूसरे ढङ्ग से कहने लगे तो वह हीन समझा जाता है और दण्डनीय होता है।

विनिश्चिते पूर्वपक्षे ग्राह्याग्राह्यविशोधिते ।
प्रतिज्ञार्थे स्थिरीभूते लेखयेदुत्तरं ततः ॥ १३७ ॥

उत्तर लेखन का निर्देश— जब पूर्वपक्ष (अर्जीदावा) पूर्ण हो जाय और उसमें ग्रहण करने या त्याग करने योग्य बातों का निर्णय हो जाय और प्रतिज्ञा किये हुये अर्थ का निश्चय हो जाय तब उसके बाद उत्तर लिखावे।

तत्राभियोक्ता प्राक् पृष्टो ह्यभियुक्तस्त्वनन्तरम् ।
प्राड्विवाकः सदस्याश्चैर्दाप्येते ह्युत्तरं ततः ॥ १३८ ॥
श्रुतार्थस्योत्तरं लेख्यं पूर्वावेदकसंनिधौ ।
पक्षस्य व्यापकं सारमसन्दिग्धमनाकुलम् ॥ १३९ ॥
अव्याख्यागम्यमित्येतन्निन्दुष्टं प्रतिवादिना ।

असंदिग्ध उत्तर के लक्षण— उसमें प्रथम वादी से पूछना चाहिये बाद में प्रतिवादी से पूछना उचित है। इन सबों के बाद प्राड्विवाक (जज), सदस्य (जूरी) आदि से उत्तर दिलावे, सुने हुये अर्थ का उत्तर प्रथम दावा करनेवाले के समीप में (समक्ष) लिखे जिसमें उसके पक्ष का व्यापक वर्णन होते हुये सारभाग हो और असंदिग्ध एवं त्रुटिशून्य हो। और जिसमें बिना व्याख्या के ही समझ में आ जाय तथा प्रतिवादी द्वारा किसी प्रकार की आपत्ति करने योग्य न हो।

सन्दिग्धमन्यत् प्रकृतादत्यल्पमतिभूरि च ॥ १४० ॥
पक्षैकदेशो व्याप्यं यत्तत्तु नैवोत्तरं भवेत् ।

सन्दिग्ध उत्तर के लक्षण— और जो उत्तर संदेहयुक्त, प्रसङ्ग से बाहर, अत्यन्त संक्षिप्त, अत्यन्त विस्तृत, पक्ष के एक ही अंश में व्याप्त रहनेवाला (अर्थात् संपूर्ण अंश पर प्रकाश न डाला गया हो) ऐसे जो उत्तर हों उन्हें नहीं लिखना चाहिये।

न चाहूतो वदेत्किञ्चिद्धीनो दण्ड्यश्च स स्मृतः ॥ १४१ ॥

दण्डयोग्य प्रतिवादी के लक्षण— और बुलाने पर भी यदि प्रतिवादी उत्तर न दे तो वह हीन एवं दण्डनीय होता है।

पूर्वपक्षे यथार्थे तु न दद्यादुत्तरं तु यः ।
प्रत्यर्थी दापनीयः स्यात् सामादिभिरुपक्रमैः ॥ १४२ ॥

पूर्वपक्ष (वादी का पक्ष) यदि यथार्थ होने पर प्रतिवादी कुछ उत्तर न