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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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कात्यायन,$^१$ कणिङ्क$^२$ भारद्वाज, दीर्घ-चारायण$^३$ ( दीर्घश्चारायणः ), घोटमुख$^४$ तथा किञ्जल्क$^५$। अर्थ-शास्त्र में ही भूयो-भूयः 'आचार्याः'$^६$ का भी उल्लेख किया गया है। यह निर्णय करना कठिन है कि यहां अन्यान्य आचार्यों का ही मत 'आचार्याः' शब्द से खण्डनार्थ प्रस्तुत किया गया है या किसी व्यक्ति-विशेष का संकेत है। महाभारत में भी एक जगह आचार्य$^७$ का उल्लेख हुआ है परन्तु वहां तो यही प्रतीत होता है कि नीति-विद्या-विशारद के अर्थ में आचार्य शब्द का प्रयोग किया गया है। महाभारत में एक 'भाष्य'$^८$ का भी उल्लेख है।

कामन्दकीय-नीति-सार की$^९$ उपाध्याय-निरपेक्षा व्याख्या में किसी ग्रन्थान्तर के उद्धरण से यह बतलाया गया है कि ब्रह्मा ने एक लाख अध्यायों में सम्पन्न एक शास्त्र की रचना की और बाद में नारद, शक्र ( इन्द्र ), बृहस्पति, भार्गव ( शुक्र ), भारद्वाज, भीष्म, पाराशर, मनु तथा अन्यान्य ऋषियों द्वारा उस ब्राह्म-शास्त्र को संक्षिप्त बनाया गया और पश्चात् पुनः विष्णुगुप्त ( कौटिल्य ) ने राजाओं के उपयोग के लिए देश-काल के अनुसार उसका संक्षेप किया।

काम-सूत्र$^{१०}$ के अनुसार यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मा ने एक लाख अध्यायों में विभक्त एक शास्त्र की रचना की और बाद में उस शास्त्र में


१. वही-पृ० ५२४।
२. वही-पृ० ५२४ ( सम्भवतः पूर्वोक्त भारद्वाज से ये अभिन्न हैं )।
३. वही-पृ० ५२४।
४. वही-पृ० ५२४।
५. वही-पृ० ५२५।
६. वही-पृ० १६, ३३२, ३४५, ३८८, ४०२, ४०९ आदि।
७. शान्ति-पर्व—१०२। ३२॥
८. शान्ति-पर्व १०३।४४।
९. ब्रह्माध्याय-सहस्राणां शतं चक्रे स्व-बुद्धिजम्।
तन्नारदेन शक्रेण गुरुणा भार्गवेण च॥
भारद्वाज-विशालाक्ष-भीष्म-पाराशरैस्तथा।
संक्षिप्तं मनुना चैव तथा चान्यैर्महर्षिभिः॥
प्रजानामायुषो ह्रासं विज्ञाय च महात्मना।
संक्षिप्तं विष्णु-गुप्तेन नृपाणामर्थ-सिद्धये॥ उ० निरपेक्षा-पृ० ८ (पूना)।
१०. प्रजापतिर्हि प्रजाः सृष्ट्वा तासां स्थिति-निबन्धनं त्रिवर्गस्य साधनम् अध्यायानां शत-सहस्रेण अग्रे प्रोवाच। तस्य ऐक-देशिकं स्वायम्भुवो मनुः धर्माधिकारिकं पृथक् चकार। बृहस्पतिः अर्थाधिकारिकम्॥ का० सू० १।१। ५-७॥