शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 384, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें२९८ | शुक्रनीतिः
अतीतकाललिखितं न स्यात्तत् साधनक्षमम् ॥ १८० ॥
अप्रगल्भेन च स्त्रिया बलात्कारेण यत् कृतम् ।
साधनायोग्य लेख्य के लक्षण—जिसमें ये सब बातें न लिखी हों वे पत्र ‘हीनलेख्य’ कहलाते हैं अर्थात् अप्रामाणिक होते हैं। और जो सिलसिलेवार न लिखा गया हो, या विपरीत अर्थ को प्रकट करने वाला, बिखरे हुये अर्थ को प्रकट करने वाला, निरर्थक, समय बीत जाने पर लिखा हुआ हो वह प्रमाण के योग्य नहीं होता है। और जो नासमझी से लिखा हुआ या स्त्री द्वारा किया हुआ या जबरदस्ती से लिखाया हुआ हो वह भी अप्रामाणिक होता है।
सद्भिर्लेख्यैः साक्षिभिश्च भोगैर्दिव्यैः प्रमाणताम् ॥ १८१ ॥
व्यवहारे नरो याति चेहामुत्राश्नुते सुखम् ।
अच्छे लेख से फल का निर्देश—मनुष्य निर्दोष लिखित प्रमाणों से, साक्षी के द्वारा, कब्जा होने से, दिव्य परीक्षादि प्रमाणों से व्यवहार में प्रामाणिकता को प्राप्त करता है। और इसलोक में तथा परलोक में सुख भोग करता है।
स्वेतरः कार्यविज्ञानी यः स साक्षी त्वनेकधा ॥ १८२ ॥
दृष्टार्थश्च श्रुतार्थश्च कृतश्चैवाऽकृतो द्विधा ।
साक्षी के लक्षण और भेद का निर्देश—जो अपना सम्बन्धी न हो एवं कार्य (विवाद विषय) को जाननेवाला हो, वह साक्षी (गवाह) मानने योग्य होता है। साक्षी अनेक प्रकार का होता है। कोई आँखों से प्रत्यक्ष देखने वाला और कोई केवल सुनने वाला होता है। कृत और अकृत भेद से साक्षी दो प्रकार के होते हैं अर्थात् वादी द्वारा उपस्थित किया हुआ ‘कृत’ और राजा द्वारा उपस्थित किया हुआ ‘अकृत’ होता है।
अर्थिप्रत्यर्थिसान्निध्यादनुभूतं तु प्राग् यथा ॥ १८३ ॥
दर्शनैः श्रवणैर्यैन स साक्षी तुल्यवाग् यदि ।
वादी या प्रतिवादी के समीप रहने से जैसा पहले देखने या सुनने से मुकद्दमे के विषय का अनुभव हुआ हो उसी के अनुरूप यदि कहने वाला हो तो वह साक्षी कहलाने योग्य होता है।
यस्य नोपहता बुद्धिः स्मृतिः श्रोत्रं च नित्यशः ॥ १८४ ॥
सुदीर्घेणापि कालेन स वै साक्षित्वमर्हति ।
बहुत समय बीत जाने पर भी जिसकी बुद्धि स्मरण शक्ति, और श्रवण शक्ति न क्षीण हो वही सचमुच साक्षी देने योग्य होता है
अनुभूतः सत्यवाग् यः सैकः साक्षित्वमर्हति ॥ १८५ ॥
उभयानुमतः साक्षी भवत्येकोऽपि धर्मवित् ।
जिसने अनुभव किया हो और सत्य बोलने वाला हो वही साक्षी के योग्य