शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३९१
स्वभावोक्तं वचस्तेषां गृह्णीयान्न बलात् क्वचित् ॥ १९८ ॥
साक्षी लेने के प्रकारों का निर्देश— स्वाभाविक रीति से कहे हुये उन (साक्षियों) के वचनों को ग्रहण करे। किसी के दबाव से उनकी कही हुई बातों को कभी न माने।
उक्ते तु साक्षिणा साध्ये न प्रष्टव्यं पुनः पुनः ।
साक्षी द्वारा साक्षी दे चुकने के बाद पुनः बुलाकर बारम्बार न पूछे।
आहूय साक्षिणः पृच्छेन्नियम्य शपथैर्भृशम् ॥ १९९ ॥
पौराणैः सत्यवचन-धर्ममाहात्म्यकीर्तनैः ।
साक्षियों को बुलाकर विशेष रूप से ईश्वर का शपथ (सौगन्द) खिलाकर एवं पुराणोक्त सत्य बोलने के धर्म का माहात्म्य वर्णन कर उनसे पूछे।
अनृतस्यातिदोषैश्च भृशमुत्त्रासयेच्छनैः ॥ २०० ॥
और पुराणोक्त झूठ बोलने में अत्यन्त दोषों को दिखाकर धीरे २ अत्यन्त भय दिखावे।
देशे काले कथं कस्मात् क्व दृष्टं वा श्रुतं त्वया ।
तुमने किस देश में और किस समय में कैसे, किस कारण से क्या देखा वा सुना है। इसे पूछे।
लिखितं लेखितं यत्तद् वद सत्यं तदेव हि ॥ २०१ ॥
जो लिखा गया या लिखाया हुआ हो वही सत्य २ कहो।
सत्यं साक्ष्यं ब्रुवन् साक्षी लोकानाप्नोति पुष्कलान् ।
इह चानुत्तमां कीर्तिं वागेषा ब्रह्मपूजिता ॥ २०२ ॥
जो साक्षी साक्षी देते समय सत्य बोलता है वह उत्तम लोकों को प्राप्त करता है। और लोक में सर्वोत्तम कीर्त्ति को प्राप्त करता है। यह वाक्य वेद में भी प्रशंसित है।
सत्येन पूयते साक्षी धर्मः सत्येन वर्धते ।
तस्मात् सत्यं हि वक्तव्यं सर्ववर्णेषु साक्षिभिः ॥ २०३ ॥
सत्य से साक्षी पूजित हो जाता है। सत्य से धर्म बढ़ता है। इससे सभी वर्णों में साक्षी को सत्य ही बोलना चाहिये।
आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी गतिरात्मैव ह्यात्मनः ।
मावमंस्थास्त्वमात्मानं नृणां साक्षित्वमुत्तमम् ॥ २०४ ॥
आत्मा ही अपना साक्षी है, और आत्मा ही अपनी गति है। इसलिये मनुष्यों का उत्तम साक्षी इस अपनी आत्मा का तुम तिरस्कार मत करो।
मन्यते वै पापकारी न कश्चित् पश्यतीति माम् ।
तांश्च देवाः प्रपश्यन्ति तथा ह्यान्तरपूरुषः ॥ २०५ ॥