शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१३
लोक (प्रजायें) भी यथेच्छ व्यवहार करने लगते हैं एवं कपटपूर्ण कार्यों में प्रवृत्त होने लगते हैं ।
अतिकामक्रोधलोभैर्यव्यवहारः प्रवर्त्तते ।
कर्त्तृनथो साक्षिणश्च सभ्यान् राजानमेव च ॥ २७० ॥
व्याप्नोत्यतस्तु तन्मूलं छित्त्वा तं विशुशं नयेत् ।
जब काम, क्रोध तथा लोभ की अधिकता से मनुष्य का व्यवहार होने लगता है तब वह फैलते २ क्रमशः कर्त्ता, साक्षी, सभ्य और राजा में भी व्याप्त हो जाता है अतः राजा उसके मूल कारण कामादि को दूर कर व्यवहार (विवाद) का विवेकपूर्वक विचार कर निर्णय करे ।
अनर्थं चार्थवत् कृत्वा दर्शयन्ति नृपाय ये ॥ २७१ ॥
अविचिन्त्य नृपस्तथ्यं मन्यते तैर्निदर्शितः ।
स्वयं करोति तद्वृत्तौ भुभ्यतेऽष्टगुणं त्वघम् ॥ २७२ ॥
जो न्यायालय के अधिकारी पुरुष अनिष्ट को इष्ट की भांति करके (दोषी को निर्दोष बताकर) राजा को दिखाते या बताते हैं । और जो बिना विचारे उन (अधिकारियों) के द्वारा प्रदर्शित विषय को सत्य मानता है और उसी के अनुसार स्वयं व्यवहार करता है अर्थात् विवाद का निर्णय करता है । तो वैसा करने पर उन सबों को राजा तथा अधिकारी पुरुषों को अठगुना पाप लगता है ।
अधर्मतः प्रवृत्तं तं नोपेक्षेरन् सभासदः ।
उपेक्ष्यमाणाः सनृपा नरकं यान्त्यधोमुखाः ॥ २७३ ॥
अधर्म में प्रवृत्त हुये राजा की सभासद् को उपेक्षा न करने का निर्देश—और उस तरह से व्यवहार करते हुये उस राजा को जो न्यायाधिकारी पुरुष अधर्म करने से नहीं रोकते हैं तो राजा के सहित वे सभी नरक को जाते हैं ।
धिग्दण्डस्त्वथ वाग्दण्डः सभ्यायत्तौ तु तावुभौ ।
अर्थदण्डवधावुक्तौ राजायत्तावुभावपि ॥ २७४ ॥
धिग्दण्ड और वाग्दण्ड इन दोनों को सभासदों के अधीन होने का निर्देश—और किसी को धिक्कार या डांट-फटकार का दण्ड देना ये दोनों दण्ड न्यायसभा के सदस्यों के अधीन रहते हैं किन्तु किसी को अर्थ दण्ड (जुर्माना) या वध दण्ड देना ये दो दण्ड तो केवल राजा ही के अधीन रहता है ।
तीरितं चानुशिष्टं च यो मन्येत विधर्मतः ।
द्विगुणं दण्डमादाय पुनस्तत्कार्यमुद्धरेत् ॥ २७५ ॥
दुबारा कार्य के आरम्भ करने में कारण का निर्देश—जो कोई विवाद करने