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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 404

३१८ शुक्रनीतिः

रूप से भोग सकती है, और चाहे वह स्थावर ( अचल ) सम्पत्ति हो तो भी किसीको बेच देने या दे देने में उसका इच्छानुसार व्यवहार कर सकती है।

ऊढया कन्यया वापि पत्युः पितृगृहाच्च यत् । मातृपित्रादिभिर्दत्तं धनं सौदायिकं स्मृतम् ॥ २९९ ॥

सौदायिक धन के लक्षण— विवाहिता या अविवाहिता कन्याको पति के पास से या पिता के गृह से माता-पिता के द्वारा दिये गये धन को 'सौदायिक' कहते हैं।

पित्रादिधनसम्बन्धहीनं यद्यदुपार्जितम् । येन स काममश्नीयादविभाज्यं धनं हि तत् ॥ ३०० ॥

अविभाज्य धन के लक्षण— पैतृक धन की सहायता के बिना जो-जो धन जिससे उपार्जित किये जाते हैं वे सभी उस उपार्जनकर्त्ता के लिये यथेष्ट भोग्य होते हैं, क्योंकि उस प्रकार के धन का भाई आदि के द्वारा विभाग नहीं किया जा सकता है।

जलतस्करराजाग्नि व्यसने समुपस्थिते । यस्तु स्वशक्त्या संरक्षेत्तस्यांशो दशमः स्मृतः ॥ ३०१ ॥

जलादिकों से धन की रक्षा करनेवाले को दशवाँ भाग प्राप्त करने का निर्देश— जो कोई व्यक्ति जल, चोर, राजा या अग्नि के द्वारा संकट में पड़े हुये किसी के वस्तु ( धन ) को अपनी शक्ति लगाकर यदि बचा लेता है तो उस धन के दशवें भाग के पाने का वह अधिकारी हो जाता है।

हेमकारादयो यत्र शिल्पं सम्भूय कुर्वते । कार्यानुरूपं निर्वेशं लभेरंस्ते यथार्हतः ॥ ३०२ ॥

जहाँ पर कई सोनार आदि मिलकर किसी शिल्प का निर्माण करते हैं वहाँ पर कार्यानुरूप यथायोग्य वे सब मजदूरी को प्राप्त करते हैं।

संस्कर्त्ता तत्कलाभिज्ञः शिल्पी प्रोक्तो मनीषिभिः ।

शिल्पी के लक्षण— किसी कला का जानकार होते हुये उसकी त्रुटियों को दूरकर सुधार करने वाले को विद्वान् लोग 'शिल्पी' कहते हैं।

हर्म्यं देवगृहं वापि बाटिकोपस्कराणि च ॥ ३०३ ॥ सम्भूय कुर्वतां तेषां प्रमुख्यो द्व्यंशमर्हति ।

धनियों का भवन, देवमन्दिर, बावड़ी या गृहसम्बन्धी उपकरणों को मिलकर बनानेवाले कारीगरों के मध्य में जो प्रधान होता है वह दो भाग मजदूरी पाने का अधिकारी होता है।

नर्तकानामेव धर्मः सङ्गिरेष उदाहृतः ॥ ३०४ ॥ तालज्ञो लभतेऽर्धार्धं गायनास्तु समांशिनः ।