शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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इनमें भी सर्वप्रथम संस्कारक थे 'भार्गव' (शुक्र)। शुक्र-नीति-सार में तो यहाँ तक कहा गया है कि शुक्र की नीति को छोड़ कर अन्य सभी नीतियाँ कुनीतियाँ हैं। महाकवि¹ दण्डी ने भी अपने दश-कुमार-चरित² में राजनीति-शास्त्र-कारों की नामावली में सर्व-प्रथम स्थान शुक्राचार्य को ही दिया है। महाकवि अश्व-घोष ने भी अपने 'बुद्ध-चरित'³ में शुक्र तथा बृहस्पति का बड़े सम्मान के साथ राज-शास्त्र के निर्माताओं के रूप में उल्लेख किया है। हमारे महाकवि कालिदास ने⁴ भी यह बतलाया है कि मनुष्य में व्यवहार-कुशलता या नीति-कुशलता का चरमोत्कर्ष शुक्र की नीति के अनुसरण से ही हो सकता है, अन्यथा नहीं।
उपर्युक्त विवरण से यह सिद्ध है कि नीति-शास्त्र-कारों में शुक्राचार्य का स्थान बहुत ही महत्त्व-पूर्ण है।
शुक्राचार्य के ग्रन्थ
ऊपर यह बतलाया जा चुका है कि शुक्राचार्य (उशना) का एक राजनीति-शास्त्र पर प्रमुख-ग्रन्थ रहा और विज्ञानेश्वर तथा कौटिल्य के आधार पर औशनस अर्थ-शास्त्र की भी सत्ता असन्दिग्ध है। जैसा प्रारम्भ में बतलाया जा चुका है कि अर्थ-शास्त्र तथा राज-नीति-शास्त्र समानार्थक शब्द हैं, अतः महाभारत में उल्लिखित राज-नीति-शास्त्र तथा विज्ञानेश्वर आदि के द्वारा निर्दिष्ट अर्थ-शास्त्र एक ही ग्रन्थ सम्भावित है। मनु के सुप्रसिद्ध मीमांसक भाष्यकार मेधातिथि ने औशनसी राज-नीति के दो श्लोक⁵ भी उद्धृत किए हैं। महाभारत में तथा अन्यान्य ग्रन्थों में भी इस ग्रन्थ के उद्धरण का संकेत भी पहले किया जा चुका है।
१. न कवेः सदृशी नीतिस्त्रिषुलोकेषु विद्यते ।
फल्ग्वेव नीतिरन्या तु कुनीतिर्व्यवहारिणाम् ॥ शु०नी०सा०४।१२४३-४ ॥
२. येऽपि मन्त्र-कर्कशाः शास्त्र-तन्त्रकाराः शुक्राङ्गिरस-बिलाशाक्ष-बृहदन्ती-पुत्र-पराशर-प्रभृतयः । द० कु० च०, उ० पी० ८ ॥
३. यद्राज-शास्त्रं भृगुरङ्गिरा च न चक्रतुर्वंशकरावुभौ तौ ।
तयोः सुतौ तौ च ससर्जतुस्तत्कालेन शुक्रश्च बृहस्पतिश्च ॥
बुद्ध-चरित १४६ ॥
४. अध्यापितस्योशनसाऽपि नीतिं प्रयुक्त-राग-प्रणिधिर्द्विषंस्ते ।
कस्यार्थ-धर्माविह पीडयामि सिन्धोस्तटावोध इव प्रवृद्धः ॥
कुमार-सम्भव-३।४६॥
५. मनु-स्मृति-७।१५ तथा ८।५० पर भाष्य ।