शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४४ | शुक्रनीतिः
जिस श्यामकर्ण घोड़े का सारा शरीर एक वर्ण का हो किन्तु वह श्वेत वर्ण हो तो वह अश्वमेध के योग्य होने से सदैव पूज्य होता है।
वैदूर्यसन्निभे नेत्रे यस्य स्तो जयमङ्गलः।
मिश्रवर्णस्त्वेकवर्णः पूज्यः स्यात् सुन्दरो यदि ॥ ११२॥
**जयमङ्गल अश्व के लक्षण—**जिस घोड़े की आंखें वैदूर्य मणि के समान कालापन युक्त सफेद हों वह 'जयमङ्गल' संज्ञक होता है। कोई भी घोड़ा चाहे अनेक वर्ण का या एक वर्ण का हो किन्तु देखने में सुन्दर हो तो वह पूज्य होता है।
कृष्णपादो हरिर्निन्यस्तथा श्वेतैकपादपि ।
रूक्षो धूसरवर्णश्च गर्दभामोऽपि निन्दितः ॥ ११३॥
जिस अश्व के पैर काले हों अथवा एक ही पैर सफेद हो किंवा जो रूप धूसर वर्ण का गदहे के समान हो वह निन्दित होता है।
कृष्णतालुः कृष्णजिह्वः कृष्णोष्ठश्च विनिन्दितः।
सर्वतः कृष्णवर्णो यः पुच्छे श्वेतः स निन्दितः ॥ ११४॥
जिसका तालु, जिह्वा और ओष्ठ कृष्ण वर्ण का हो अथवा सर्वत्र कृष्ण वर्ण का हो किन्तु पूंछ श्वेत वर्ण की हो तो वह निन्दित होता है।
उच्चैः पदन्यासगतिर्द्विपव्याघ्रगतिश्च यः।
मयूरहंसतित्तिरपारावतगतिश्च यः ॥ ११५॥
मृगोष्ट्रश्वानरगतिः पूज्यो वृषगतिर्हयः ।
**अश्वों की श्रेष्ठ गति के लक्षण—**जो अश्व ऊंचा पैर उठाकर चलता हो किंवा जिसकी चाल हाथी अथवा सिंह की सी हो और जिसकी मोर, हंस, तीतर, कबूतर, मृग, ऊँट या बैल की सी चाल हो तो वह पूज्य (श्रेष्ठ चालवाला) होता है।
अतिमुक्तोऽतिपीतोऽपि यथा सादी न पीड्यते ॥ ११६॥
श्रेष्ठा गतिस्तु सा ज्ञेया स श्रेष्ठस्तुरगो मतः।
घोड़े की वही चाल श्रेष्ठ कहलाती है कि जिससे अत्यन्त भोजन करके या अत्यन्त जल पीकर के भी सवारी करने पर सवार को कष्ट न मालूम पड़े। और वही घोड़ा श्रेष्ठ भी माना जाता है।
सुश्वेतभालतिलको विद्धो वर्णान्तरेण च ॥ ११७॥
स वाजी दलभञ्जी तु यस्य सैवातिनिन्दितः।
**निन्दित 'दलभंजी' अश्व के लक्षण—**जिस अश्व के मस्तक का श्वेत तिलक अन्य वर्ण से मिश्रित भी हो तो वह 'दलभंजी' नामक कहा जाता है और वह तथा उसका स्वामी दोनों निन्दित माने जाते हैं।