शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 443, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३५७
भाला आदि को 'शस्त्र' कहते हैं । और अस्त्र दो प्रकार के होते हैं । उनमें से पहला नालिक ( बन्दूक तोप ), दूसरा मान्त्रिक ।
यदा तु मान्त्रिकं नास्ति नालिकं तत्र धारयेत् ॥ १९२ ॥
सह शस्त्रेण नृपतिर्विजयार्थं तु सर्वदा ।
मान्त्रिक अस्त्र के अभाव में नालिक अस्त्र का प्रयोग करने का निर्देश—
राजा विजय-प्राप्ति के लिये सदा अस्त्र के साथ २ जहां पर मान्त्रिक अस्त्र न हों वहां पर नालिक अस्त्र सेना में रक्खे ।
लघुदीर्घाकारधाराभेदैः शस्त्रास्त्रनामकम् ॥ १९३ ॥
प्रथयन्ति नवं भिन्नं व्यवहाराय तद्विदः ।
शस्त्रास्त्र के विद्वान लोग व्यवहार के लिये लघु तथा दीर्घ आकारों के धारा ( प्रयोग करने की रीति विशेष ) भेद से शस्त्र तथा अस्त्रों के नामों में नये २ भेद प्रकाशित करते हैं ।
नालिकं द्विविधं ज्ञेयं बृहत्क्षुद्रविभेदतः ॥ १९४ ॥
नालिक के २ प्रकारों का निर्देश— नालिक ( बन्दूक आदि ) अस्त्र-बृहत् ( तोप ) तथा क्षुद्र ( बन्दूक ) भेद से २ प्रकार का होता है ।
तिर्यगूर्ध्वच्छिद्रमूलं नालं पञ्चवितस्तिकम् ।
मूलाग्रयोर्लक्ष्यभेदि तिलबिन्दुयुतं सदा ॥ १९५ ॥
यन्त्राघाताग्निकृद् ग्रावचूर्णधृक्कर्णमूलकम् ।
सुकाष्ठोपाङ्गबुध्नं च मध्याङ्गुलबिलान्तरम् ॥ १९६ ॥
स्वान्तेऽग्निचूर्णसंघातृशलाकासंयुतं दृढम् ।
लघुनालिकमप्येतत् प्रधार्यं पत्तिसादिभिः ॥ १९७ ॥
लघुनालिका ( बन्दूक ) के लक्षण— जिसमें नाल ऐसी हो जिसमें मूल की तरफ से तिरछा ऊपर की ओर तक छिद्र हो और वह ५ बालिश्त लम्बी हो, और जिसके मूल तथा अग्रभाग में लक्ष्य को भेद करने में सहायक तिल-बिन्दु सदा लगे हों । यन्त्र द्वारा आघात होने पर अग्नि पैदा करनेवाले ग्राव-चूर्ण ( बारूद ) जिसके मूल के कर्ण भाग में भरे हुये हों । और जिसका पृष्ठ भाग, जो पकड़ने के लिये होता है, उसके अङ्गो-पाङ्ग सुन्दर काष्ठ के बने हुये हों । एवं नाल का छिद्र एक अंगुल चौड़ा हो । और जिसके भीतर अग्निचूर्ण ( बारूद ) भरा जाता हो और उसे भरने की शलाका भी जिसके साथ लगी हुई हो और जो दृढ़ हो, इसे लघु नालिक ( बन्दूक ) कहते हैं । इसे पैदल तथा घुड़सवार सैनिकों को रखना चाहिये ।
यथा यथा तु त्वक्सारं यथा स्थूलबिलान्तरम् ।
यथा दीर्घं बृहद्गोलं दूरभेदि तथा तथा ॥ १९८ ॥