शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४३ )
कुछ मुख्य विषयों का संक्षिप्त विवरण निम्न-लिखित है :-
( क ) राज्योत्पत्ति :- मनु याज्ञवल्क्य आदि के समान ही शुक्रनीति में भी राजा को आठ लोकपालों¹ की समष्टि मानी गई है और इस प्रकार राज्योत्पत्ति के विषय में इसका दैवीसिद्धान्त ( Divine Right) प्रतीत होता है।
( ख ) राजा :- शु० नी० के अनुसार राजा के दो रूप हैं 'देवांश' तथा 'राक्षसांश'। औचित्य का ही अवलम्बन करनेवाला राजा 'देवांश'² है और अनौचित्य का अवलम्बन करनेवाला 'राक्षसांश'³। यद्यपि अन्यान्य शास्त्रों में भी अधर्मकारी राजा को पापी बतलाया गया है तथापि दो रूपों में इस प्रकार का स्पष्ट वर्गीकरण नहीं है।
( ग ) राजा के कर्त्तव्य :- शु० नी० के अनुसार राजा के मुख्य कर्त्तव्य हैं प्रजा-पालन तथा दुष्ट-दमन⁴। अतएव प्रजानुरञ्जन भी राजा के कर्त्तव्यों में आ ही जाता है। इनके अतिरिक्त राजसूय आदि यज्ञों का अनुष्ठान, न्याय-पूर्वक कोश-सम्वर्धन, अन्य राजाओं का वर्गीकरण, शत्रुओं का दमन, भूमि का अर्जन भी राजा के प्रमुख⁵ कर्त्तव्य हैं।
( घ ) उत्तराधिकार :- उत्तराधिकार या यौवराज्य के विषय में शुक्राचार्य का कथन है कि ज्येष्ठ औरस पुत्र प्रथम⁶ अधिकारी है। परन्तु यदि उसमें त्रुटि हो तो उसके स्थान पर कनिष्ठों में ज्येष्ठ भ्राता अथवा भ्रातृ-पुत्र को राज्याधिकार⁷ मिलना चाहिए। परन्तु यौवराज्याधिकार के विवरण के समय ज्येष्ठ पुत्र के अनधिकारी होने पर या अभाव में प्रथम स्थान पितृव्य (चाचा) को⁸ दिया गया है। अतः यह प्रतीत होता है कि राज्याधिकारी में पितृव्य भी आते हैं। इन सर्वो के अभाव में दत्तक पुत्र और उसके अभाव में दौहित्र और उसके अभाव में भगिनी-पुत्र (भाञ्जा) को उत्तराधिकार प्राप्त होता⁹ है।
| १. वही १।७१ ॥ | २. वही १।७१-८५ ॥ |
| ३. वही १।७०, ८६ ॥ | ४. वही १।१४ ॥ |
| ५. वही १।१२३-२४ ॥ | ६. वही १।३४१; २।१३ ॥ |
| ७. वही १।३४२-४३ ॥ | ८. वही २।१५ ॥ ९. वही २।१५-१६ ॥ |