शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७१
मुख भाग हो और उसमें दो ओष्ठ भाग हों। ऐसी पंक्ति में स्थित सेना को 'मकरव्यूह' कहते हैं।
सूचीसूक्ष्ममुखो दीर्घ-समदण्डान्तरन्ध्रयुक् ।
**सूचीमुख तथा चक्रव्यूह के लक्षण—**जिसका मुखभाग सूची के समान पतला हो और मध्यभाग समान भाव से दण्डाकार लम्बा हो, तथा अन्त में स्थित मुखभाग में छिद्रयुक्त हो ऐसी सेना की पंक्ति को 'सूचीमुख' व्यूह कहते हैं।
चक्रव्यूहश्चैकमार्गो ह्यष्टधा कुण्डलीकृतः ॥ २८१ ॥
जो चक्राकार गोल हो एवं मध्य में आठ भागों में विभक्त कुंडली आकार के मार्ग बने हों एवं उसके अन्दर घुसने के लिये एक ही मार्ग हो तो ऐसी सेनापंक्ति को 'चक्रव्यूह' कहते हैं।
चतुर्दिक्ष्वष्टपरिधिः सर्वतोभद्रसंज्ञकः ।
अमार्गश्चाष्टवलयी गोलकः सर्वतोमुखः ॥ २८२ ॥
**सर्वतोभद्र व्यूह के लक्षण—**जिसके चारों दिशाओं में ८-८ रेखाकार परिधि-रूप में सेना की पंक्ति हो उसे 'सर्वतोभद्र' व्यूह कहते हैं, अथवा सभी ओर जिसके मुख हों और जो आठ वलयाकार गोल पंक्तियों से युक्त एवं घुसने के मार्ग से रहित हो उसे भी 'सर्वतोभद्र' व्यूह कहते हैं।
शकटः शकटाकारो व्यालो व्यालाकृतिः सदा ।
**शकट व व्यालव्यूह के लक्षण—**शकटाकार सेनापंक्ति को 'शकटव्यूह' एवं व्याल (सर्प) के आकार की सेनापंक्ति को 'व्यालव्यूह' कहते हैं।
सैन्यमल्पं बृहद्वाऽपि दृष्ट्वा मार्गं रणस्थलम् ॥ २८३ ॥
व्यूहैर्व्यूहेन व्यूहाभ्यां सङ्करेणापि कल्पयेत् ।
**सैन्य की न्यूनता व अधिकतानुसार एवं युद्धभूमि के अनुसार १ या २ व्यूहरचना का निर्देश—**सैन्य की न्यूनता तथा अधिकता एवं मार्ग तथा रणस्थल भूमि को देखकर तदनुसार एक व्यूह अथवा दो या दो से अधिक व्यूहों से मिश्रित व्यूह-रचना की भी कल्पना की जा सकती है।
यन्त्रास्त्रैः शत्रुसेनाया भेदो येभ्यः प्रजायते ॥ २८४ ॥
स्थलेभ्यस्तेषु सन्तिष्ठेत् ससैन्यो ह्यासनं हि तत् ।
**आसन के लक्षण व उस समय के कर्तव्य—**जिन स्थलों से शत्रुसेना के ऊपर यन्त्रयुक्त अस्त्रों (तोप आदि) के द्वारा प्रहार करके उसका भेदन किया जा सके उन स्थलों में सेना के सहित राजा के ठहरने को 'आसन' कहते हैं।
तृणान्नजलसम्भारा ये चान्ये शत्रुपोषकाः ॥ २८५ ॥
सम्यङ् निरुध्य तान् यत्नात् परितश्चिरमासनात् ।
और तृण अन्न, जल आदि सामग्री तथा और भी जो वस्तुयें शत्रु की