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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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३६४ | शुक्रनीतिः

बहूनामैकमत्यं हि नृपतेर्बलवत्तरम् ॥ ४१९ ॥
बहुसूत्रकृतो रज्जुः सिंहाद्याकर्षणक्षमः।
**राजा से बढ़कर बहुमत की महत्ता का निर्देश—**बहुतों का ऐकमत्य निश्चय ही राजा से भी अधिक बलवान होता है अर्थात् उसके आगे राजा झुक जाता है क्योंकि बहुत लरों की बनी रस्सी सिंहादि को भी खींच लाने में समर्थ होती है।

हीनराज्यो रिपुभृत्यो न सैन्यं धारयेद् बहु ॥ ४२० ॥
कोशवृद्धिं सदा कुर्यात् स्वपुत्राद्यभिवृद्धये ।
**हीन-राज्य राजा के आचरणों का निर्देश—**साधारण राज्यवाला एवं दुष्ट भृत्यवाला क्षुद्र राजा अपने पास बहुत सेना न रक्खे, बल्कि वह सदा अपने पुत्रादि का अभ्युदय होने के निमित्त कोशवृद्धि ( खजाने में द्रव्य जमा ) करता रहे ।

क्षुधया निद्रया सर्वमशनं शयनं शुभम् ॥ ४२१ ॥
भवेद्यथा तथा कुर्यादन्यथाऽऽशु दरिद्रकृत् ।
दिशाऽनया व्ययं कुर्यान्नृपो नित्यं न चान्यथा ॥ ४२२ ॥
धर्मनीतिविहीना ये दुर्बला अपि वै नृपाः ।
सुधर्मबलयुग् राज्ञा दण्ड्यास्ते चौरवत् सदा ॥ ४२३ ॥
**राजा के दरिद्र हो जाने के कारणों का निर्देश—**जब भूख लगे तब भोजन और जब नींद लगे तब शयन करना ये सब राजा के लिये शुभ फलप्रद होते हैं। अन्यथा भोजन-शयन से शीघ्र दरिद्रता आ जाती है। इस रीति से राजा को व्यय करना चाहिये कि वह शीघ्र दरिद्र न हो जाय, अतः इससे अन्य रीति का आश्रय करना अनुचित है। जो धर्म तथा नीति से विहीन और दुर्बल राजा हैं, उनको धर्म तथा बल से युक्त राजा सदा चोर की भांति दण्ड दे ।

सर्वधर्मावनान्नीचन्नृपोऽपि श्रेष्ठतामियात् ।
उत्तमोऽपि नृपो धर्मनाशनान्नीचतामियात् ॥ ४२४ ॥
**धार्मिक नीच राजा को भी श्रेष्ठ होने का निर्देश—**सम्पूर्ण राज-धर्मों की रक्षा ( पालन ) करते रहने से नीच ( क्षुद्र ) भी राजा श्रेष्ठता को प्राप्त हो जाता है और उत्तम भी राजा राजधर्मों की रक्षा न करने से नीचता को प्राप्त हो जाता है ।

धर्माधर्मप्रवृत्तौ तु नृप एव हि कारणम् ।
स हि श्रेष्ठतमो लोके नृपत्वं यः समाप्नुयात् ॥ ४२५ ॥
**धर्म तथा अधर्म की प्रवृत्ति में राजा की ही कारणता का निर्देश—**लोगों की धर्म तथा अधर्म में प्रवृत्ति में होने में कारण राजा ही होता है अर्थात् राजा के