शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ३६७
युद्ध का शौक रखनेवाला राजा सहसा अपनी सेना को युद्ध में भेजकर नष्ट कर देवें।
दानमानैर्वियुक्तोऽपि न भृत्यो भूपतिं त्यजेत् ।
समये शत्रुसान्नैव गच्छेज्जीवधनाशया ॥ ७ ॥
दान-मान से रहित भी भृत्य को अपने राजा को न छोड़ने का निर्देश—
भृत्य (सैनिक) भी दान तथा सम्मान न पाने पर भी अपने स्वामी राजा का साथ असमय में न छोड़ देवे। और जीवन-रक्षा तथा धन की आशा से समय आ जाने पर शत्रु के अधीन भी न हो।
मेघोदकैस्तु या पुष्टिः सा किं नद्यादिवारितः ।
प्रजापुष्टिर्नृपद्रव्यैस्तथा किं धनिनां धनात् ॥ ८ ॥
**राजा के द्रव्य को मेघ-जल के समान पुष्टिप्रद होने का निर्देश—**जैसे मेघ के जल (वर्षा) से जैसी पुष्टि धान्यादि की होती है वैसी भला नदी आदि के जल से सींचने से हो सकती है। कदापि नहीं। वैसे ही राजद्वारा प्राप्त धनों से जैसी पुष्टि प्रजा की हो सकती है वैसी क्या धनियों के दिये हुए धन से कभी हो सकती है। कदापि नहीं।
दर्शयन् मार्दवं नित्यं महावीर्यबलोऽपि च ।
रिपुराष्ट्रे प्रविश्यादौ तत्कार्ये साधको भवेत् ॥ ९ ॥
**शत्रु का राज्य हरण करने का उपाय—**वीर्य तथा सेना अधिक रहने पर भी अपनी मृदुता का प्रदर्शन करता हुआ शत्रु के राज्य में घुस कर प्रथम उसके नित्य कार्य को सिद्ध करनेवाला बने।
सञ्जातबद्धमूलस्तु तद्राज्यमखिलं हरेत् ।
अथ तद्द्विष्टदायादान् सेनपानंशदानतः ॥ १० ॥
तद्राज्यस्य वशीकुर्यान्मूलमुन्मूलयन् बलात् ।
उसके बाद जब वहां पर हर तरह से अपनी जड़ दृढ़ हो जाय तब संपूर्ण शत्रु के राज्य को ले ले। वह इस तरह से कि शत्रु के साथ द्वेष रखनेवाले उसके भाई-पट्टीदारों एवं सेनापतियों को उसके राज्य का अंश (कुछ भाग) देने के द्वारा उसके जड़ को बलपूर्वक उखाड़ता हुआ, उन सबों को भी अपने अधीन कर ले।
तरोः संक्षीणमूलस्य शाखाः शुष्यन्ति वै यथा ॥ ११ ॥
सद्यः केचिच्च कालेन सेनपाद्याः पतिं विना ।
**राजा के बिना सेनापति आदि को भी शक्तिहीन होने का निर्देश—**जैसे जड़ कट जाने पर पेड़ की शाखायें सूख जाती हैं, वैसे ही राजा के बिना सेना-