शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमाध्याये खलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०७
अस्ति बुद्धिमतां श्रेणिर्न त्वेको बुद्धिमानतः ॥ ६६ ॥
देशे काले च पुरुषे नीतिं युक्तिमनेकधाम् ।
कल्पयन्ति च तद्विद्या दृष्ट्वा रुद्धां तु प्राक्तनीम् ॥ ६७ ॥
और बुद्धिमानों की श्रेणी होती है न कि सिर्फ एक ही कोई बुद्धिमान होता है अतः चतुर लोग जहां पर सत्यरूपा युक्ति निष्फल देखते हैं वहां पर देश, काल तथा पात्र के अनुसार अनेक प्रकार की नीति तथा युक्ति की कल्पना करते हैं ।
मन्त्रौषधिपृथग्वेष-कालवागर्थसंश्रयात् ।
छद्म सञ्जनयन्तीह तद्विद्याकुशला जनाः ॥ ६८ ॥
छल का वर्णन— इस संसार में माया (छल) करने में निपुण लोग मन्त्र, औषध, नाना प्रकार के वेष, काल, वचन और अर्थ, इन सबों का आश्रय लेकर छल-प्रयोग करते हैं ।
लोकेऽधिकारिप्रत्यक्षं विक्रीतं दत्तमेव वा ।
वस्त्रभाण्डादिकं क्रीतं स्वचिह्नैरङ्कयेच्चिरम् ॥ ६९ ॥
लोक में बेंची हुई (वस्त्र-पात्र आदि), दी हुई (किसी को दान में दे दी गई) तथा खरीदी हुई वस्तुओं पर उनके अधिकारी (बेंचने, देने तथा खरीदनेवाले) लोगों के सामने उनको अपनी २ मुहरों से ऐसा चिह्न बना देना चाहिये, जो बहुत दिन तक न मिट सके ।
स्तेनकूटनिवृत्त्यर्थं राज्ञातं समाचरेत् ।
जडान्धबालद्रव्याणां दद्याद् वृद्धिं नृपः सदा ॥ ७० ॥
चोरों की जालसाजी रोकने के लिये अर्थात् चोरी का माल न बिकने पावे, इसके लिये उन बिकी हुई वस्तुओं की सूचना राजा को दे देनी चाहिये अर्थात् लिखा देनी चाहिये । और जड़, अन्ध तथा लड़कों के जो धन हों, उनको यदि राजा के पास रक्खा जाय तो राजा उसका सूद बराबर उन सबों को दे ।
स्वीया तथा च सामान्या परकीया तु स्त्री यथा ।
त्रिविधो भृतकस्तद्वदुत्तमो मध्यमोऽधमः ॥ ७१ ॥
तीन प्रकार के भृत्यों का निर्देश— जैसे स्त्री स्वीया (अपनी), सामान्या (वेश्या आदि) और परकीया (दूसरे की) भेद से ३ प्रकार की होती है। वैसे भृत्य भी उत्तम, मध्यम तथा तथा अधम भेद से तीन प्रकार का होता है ।
स्वामिन्येवानुरक्तो यो भृतकस्तूत्तमः स्मृतः ।
सेवते पुष्टवृत्तीदं प्रकरं स च मध्यमः ॥ ७२ ॥