शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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| ४२० | शुक्रनीतिः |
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| तमाचरेच्च सा नाति २४१ | तृतीयेऽङ्गे तु सन्दंशौ ३५१ | दशताले तु विज्ञेयो २६७ |
| तरुण्यस्या वा महती २१५ | तेजस्वी क्षमते सर्वं १४९ | दशतालोर्ध्वमानं तु २६७ |
| तस्माच्छास्त्रत एव स्यात् ३१६ | ते राष्ट्रगुप्तये सन्ध्यायां २२२ | दशनैः अवणैर्येन २१८ |
| तस्मात् सर्वप्रयत्नेन १९६ | त्यक्तस्वधर्माचरणा ७ | दशमापमितं ताम्रं २०० |
| तस्मादेतत् त्रयं त्यक्त्वा १९१ | त्यक्त्वा नीतिबलं स्वीय २०२ | दश वाऽष्टौ पलं मूल्यं २१६ |
| तस्मान्न केवलसामर्थ्या ३०३ | त्यक्त्वेतान् दुर्गुणान् यज्ञा १२९ | दशशखाखिभियुक्तो ४०९ |
| तस्मिन् स्थितं चेन्न बहु १५७ | त्यजन्तु सैनिका नित्यं १८८ | दस्युभिः पीडनं शत्रोः १८६ |
| तस्य तेभ्यो न साहाय्यं स्याद् २१९ | त्रयोदशाङ्गुलं चाधः २५२ | दशहस्तमितः कुन्तः ३६० |
| तस्य सर्वगुणैः किन्तु १४६ | त्रिंशद्भोजनगन्ता वै २१६ | दशाङ्गुला विस्तृतितस्तद् २५५ |
| तस्यापि शासनं तैस्तु ३१९ | त्रिकंसस्यो यदावर्त्त ३४१ | दशैकाङ्गुलपरिधी ३३५ |
| ताडनं द्रव्यहरणं १८८ | त्रिकूटः स परिक्षेपो ३३९ | दातृत्वं धनिके शौर्यं १६५ |
| ताडनं बन्धनं पश्चात् १९४ | त्रिकोष्ठैः पञ्चकोष्ठैर्वा ३६ | दातॄणां धार्मिकाणां च १४३ |
| ताडयेन्मध्यमातेन ३४५ | त्रिगुणा वा यथाकाम ३६ | दानं सेवैव शूद्रादेः २१४ |
| तादृक् संचारयेद् कौश ३७० | त्रिचतुःपञ्चकृत्वो वा ३०६ | दानक्षीणा विवर्धिष्णुः १६१ |
| तानप्याह्वानयेद्राजा २८६ | त्रिधा वा पञ्चधा कृत्वा २१९ | दानमानस्सत्यशौर्यं ४०४ |
| तामसी कृष्णवर्णा तु २६१ | त्रिभिर्दोषैर्बलं भार्यं ४६ | दानमानापमानं च १४७ |
| ताम्राधिकं सार्धगुणं २१५ | त्रिभिर्वा पञ्चभिर्वापि ७३ | दानमानैर्विमुक्तोऽपि ३१७ |
| तालज्ञो ह्यमतेऽपार्थ ३१८ | त्रिशतं दारपुत्रास्ते ३३१ | दानशौण्डः क्षमी शूरो ५ |
| तावद् भवन्ति ते दोषा ३४६ | त्रिहस्तदण्डाञ्छिखिनो ३६० | दानार्थं च विना स्वेतः १५५ |
| तावुभौ चौरवच्छास्यौ ३२० | त्रेतायुगे पूर्णदण्डः १९० | दानेन वर्धते नित्यं १५५ |
| तिर्यगूर्ध्वच्छिद्रमूलं ३५७ | त्र्यङ्गुलं तु भवेद्धानु २५६ | दान्तं कुलीनं मध्यस्थ २७० |
| तिक्तमांसादिलेहानां २३५ | दान्तः शूरश्च शक्ताश्च १४ | |
| तिष्ठन्ति सधनद्वारे १५६ | द | दान्तास्तु सधनो यस्तु ७९ |
| तिष्ठन्तौ सूपविष्टां वा २५९ | दंडक्यो नृपतिः कामात् २३ | दासे भृत्येष्व भार्यायां ४३ |
| तिष्ठन्ती नाहनस्था २४९ | दक्षत्र्यंशगता चानु ११२ | दास्यमेके च गच्छन्ति १५६ |
| तीक्ष्णवाक्यानमित्रमपि १६४ | दक्षसंस्था वामसंस्था ५१ | दास्यामि कार्यमाना सा ११७ |
| तीरितं चानुशिष्टं च ३१३ | दण्डभूभागशुल्काना २०२ | दास्याभ्यापत्समुत्तीर्णं ४०४ |
| तुरं मन्दं च कुटिलं ७६ | दण्डभूभागशुल्केस्तु २०३ | दिव्यावलम्बने मिथ्या ४०६ |
| तुरप्रचण्डवेगश्च ११८ | दत्तं लेख्यं साक्षिमथ १०४ | दीर्घदर्शी सदा च स्यात् १३७ |
| तुलाकृषितमूल्यं स्यात् २११ | दद्यात्प्रतिकर्षकाय २२० | दीर्घद्वेषी क्रूरमद ३६२ |
| तुलापूतखलीनः स्याद् ३४५ | दद्याद्गृहीतमिष १५९ | दीर्घं चतुर्भागभूत ११२ |
| तुज्ञाशासनमानानां ४३ | दद्याद्देशानुरूपं तु १०२ | दीर्घोरुजङ्घा विकटा २६७ |
| तूर्यमङ्गलघोषेण ३८६ | दन्तः षडङ्गुलो दीर्घं २६४ | दुःखदो विपरीतो यो १६७ |
| तृतीयः शपथः प्रोक्तः ३०५ | दन्तोल्लेखनकश्चैव २८१ | दुःखाय कन्यकाऽन्येषां १६९ |
| तृतीयांशं चतुर्थांश २१८ | दम्पत्योः कलहे साक्ष्यं १३६ | दुरात्मनां च प्राबल्यं १६१ |
| तृतीयांरुकमूलो वा ३५ | दम्मो दंड इति स्यात २४ | दुष्कर्मदण्डको राजा १२ |
| तृतीयांशाग्निहीनं तु २१२ | दयाङ्कुमुंदुवाग्दान ८१ | दुष्टनिग्रहणं कुर्यात् २६९ |
| तृतीयांशविहीनेन ३३६ | दर्पस्तु परहासेच्छा ४०१ | दुष्टनिग्रहणं दानं २० |
| तृतीयांशाधिकं दैर्ध्यं ३३४ | दर्शयन् मार्दवं नित्यं ३१७ | दुष्टयानात्पादगसी १७३ |