श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ प्रपञ्चस्यापरित्यागान्न मोक्षसिद्धिः। प्रपञ्चका त्याग न होनेसे मोक्षकी भी प्राप्ति नहीं होगी । इसलिये 'उससे ततश्च जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेती- अभिन्नरूपसे सेवित होनेपर अमरत्व प्राप्त करता है' इस प्रकार जो तिमोक्षोपदेशोऽनुपपन्न एवेत्या- मोक्षका उपदेश किया है वह अनुपयुक्त ही है—ऐसी आशङ्का शङ्कयाह— करके श्रुति कहती है— उद्गीतमेतत्परमं तु ब्रह्म तस्मिंस्त्रयं सुप्रतिष्ठाक्षरं च । अत्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा लीना ब्रह्मणि तत्परा योनिमुक्ताः ॥ ७ ॥ प्रपञ्चसे पृथक्रूपसे वर्णन किया गया यह ब्रह्म सर्वोत्कृष्ट ही है। उसमें [ भोक्ता, भोग्य और नियन्ता—ये ] तीनों स्थित हैं। वह इनकी सुप्रतिष्ठा और अविनाशी है। इसमें प्रवेशद्वार पाकर ब्रह्मवेत्तालोग ब्रह्ममें लीन हो समाधिनिष्ठामें स्थित हुए जन्म-मरणसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ७ ॥ उद्गीतमिति । सप्रपञ्चं ब्रह्म 'उद्गीतम्' इत्यादि । यदि ब्रह्म यदि स्यात्ततो भवत्येव मोक्षा- प्रपञ्चयुक्त होता तब तो [ उसकी प्राप्तिमें ] मोक्षका अभाव हो सकता भावः । न त्वेतदस्ति । कस्मात् ? था । किन्तु ऐसी बात है नहीं । यत उद्गीतमुद्धृत्य गीतमुपदिष्टं कैसे नहीं है ? क्योंकि वेदान्तोंने कार्यकारणलक्षणात्प्रपञ्चाद्वेदान्तैः। इसका कार्य-कारणरूप प्रपञ्चसे अलग करके गान यानी उपदेश "अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- किया है । तात्पर्य यह है कि "वह दितादधि" (के० उ० १। ३)। विदितसे भिन्न है और अविदितसे