श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 108, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें९४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
इत्यर्थः । तत्पराः समाधिपराः किं | जाते हैं । और तत्पर अर्थात् कुर्वन्ति योनिमुक्ता भवन्ति गर्भ- | समाधिपरायण होकर क्या करते जन्मजरामरणसंसारभयान्मुक्ता | हैं?—योनिमुक्त हो जाते हैं; अर्थात् भवन्तीत्यर्थः । | गर्भवास, जन्म, जरा और मरणरूप | संसारके भयसे मुक्त हो जाते हैं । तथा च योगियाज्ञवल्क्यो | इसी प्रकार योगियाज्ञवल्क्य भी उक्तार्थे स्मृति- ब्रह्मात्मनैवावस्थितं | ब्रह्मात्मभावसे स्थित होनेको ही प्रमाणदर्शनम् समाधिं दर्शयति— | समाधिरूपसे प्रदर्शित करते हैं— “यदर्थमिदमद्वैतं | “यह जो सबका कारणरूप अद्वैत- भारूपं सर्वकारणम् । | तत्त्व है प्रकाशस्वरूप, आनन्दमय, आनन्दममृतं नित्यं | अमृत, नित्य और समस्त भूतोंमें सर्वभूतेष्ववस्थितम् ॥ | ओतप्रोत है। अनन्यचित्त पुरुष उस तदेवानन्यधीः प्राप्य | परमात्माको ही आत्मस्वरूपसे प्राप्त- परमात्मानमात्मना । | कर उसीमें लीन हो जाता है। वही तस्मिन्प्रलीयते त्वात्मा | समाधि कहलाती है। इन्द्रियोंको समाधिः स उदाहृतः॥ | अपने वशमें कर यमादि गुणोंसे इन्द्रियाणि वशीकृत्य | सम्पन्न हो मनको आत्मामें लगावे यमादिगुणसंयुतः । | और आत्माको परमात्मामें । फिर आत्ममध्ये मनः कुर्या- | स्वयं परमात्मभावसे स्थित हो कुछ दात्मानं परमात्मनि ॥ | भी चिन्तन न करे। तब यह चित्त परमात्मा स्वयं भूत्वा | अखण्ड प्रत्यगात्मामें लीन हो जाता न किञ्चिच्चिन्तयेत्ततः । | है। वही प्रत्यगात्मा है—ऐसा तदा तु लीयते त्वात्मा | ब्रह्मवादियोंने कहा है” ॥ ७ ॥ प्रत्यगात्मन्यखण्डिते॥ | प्रत्यगात्मा स एव स्या- | दित्युक्तं ब्रह्मवादिभिः॥” | इति ॥७॥ |