श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 117, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३
[वाम भाग / संस्कृत]
असर्वात्मा जीवः, विश्वैश्वर्य आप्तकामः परमेश्वरः, अल्पै- श्वर्योऽनाप्तकामो जीवः, “सर्वतः- पाणि०” (श्वेता० उ० ३।१६) “सहस्रशीर्षा” (श्वेता० उ० ३। १४) । “नित्यो नित्यानाम्” (श्वेता० उ० ६।१३) इत्या- दिना जीवेश्वरयोर्विलक्षणव्यव- हारसिद्धिः स्यात् । न तु भोक्त्रा- दिप्रपञ्चसिद्धिरस्ति स्वतः कूटस्था- परिणाम्यद्वितीयस्य वस्तुनोऽभो- क्त्रादिरूपत्वात् । नापि परतो ब्रह्मव्यतिरिक्तस्य भोक्त्रादि- प्रपञ्चहेतुभूतस्य वस्त्वन्तरस्याभा- वात् । वस्त्वन्तरसद्भावेऽद्वैत- हानिरित्याशङ्क्याह—अजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थयुक्तेति ।
भवेदयमीश्वराद्यविभागः यदि (पार्श्व-टिप्पणी: मायया वैलक्षण्य-साधनम्) प्रपञ्चासिद्धिरेव स्यात् । सिध्यत्येव प्रपञ्चः । हि यस्मदर्थे। यस्मदजा प्रकृतिर्न जायत इत्यजा सिद्धा प्रसव-
[दक्षिण भाग / हिन्दी भाष्यार्थ]
जीव सबका आत्मा नहीं है, परमेश्वर सर्वैश्वर्यसम्पन्न और पूर्ण- काम है, जीव अल्पैश्वर्यवान् है और वह पूर्णकाम नहीं है, तथा “उसके सब ओर हाथ हैं” “वह सहस्र मस्तकों- वाला है” “वह नित्योंका नित्य है” इत्यादि वाक्योंसे जीव और ईश्वरके भेदव्यवहारकी सिद्धि हो सकती है। किन्तु भोक्तादि प्रपञ्चकी सिद्धि स्वतः तो हो नहीं सकती, क्योंकि कूटस्थ, अपरिणामी, अद्वितीय वस्तु अभोक्तादिरूप है तथा परतः (किसी अन्यसे) भी उसकी सिद्धि नहीं हो सकती है, क्योंकि ब्रह्मसे अतिरिक्त भोक्तादि प्रपञ्चकी हेतुभूत किसी अन्य वस्तुकी सत्ता ही नहीं है। कारण, किसी अन्य वस्तुकी सत्ता स्वीकार करनेपर तो अद्वैत ही सिद्ध नहीं हो सकता। ऐसी शंका होनेपर श्रुति कहती है—‘भोक्ताके भोग्य- सम्पादनमें एकमात्र अजा (प्रकृति) ही नियुक्त है।’
यदि प्रपञ्च सिद्ध न होता तो यह ईश्वरादिका विभाग न होना सम्भव था, किन्तु प्रपञ्च तो सिद्ध होता है। मूलमें 'हि' शब्द 'क्योंकि' के अर्थमें है। क्योंकि अजा-प्रकृति, जो उत्पन्न होनेके कारण अजा है, प्रसवधर्मिणी सिद्ध है।