श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
श्वैश्वर्यं हित्वाप्तकाम आत्मकामः | तृतीय अवस्थाके सम्पूर्ण ऐश्वर्यको पूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्मरूपोऽवति- | छोड़कर आप्तकाम और आत्मकाम ष्ठते । | हो पूर्णानन्द अद्वितीय ब्रह्मरूपसे | स्थित हो जाता है । एतदुक्तं भवति—सम्यग्दर्श- | यहाँ यह कहा गया है कि नस्य तथाभूतवस्तुविषयत्वेन नि- | सम्यग्दर्शन तो यथार्थ वस्तुको विषय र्विषयपूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्मविषय- | करनेके कारण निर्विशेष पूर्णानन्दा- त्वाद्विज्ञानानन्तरमविद्यातत्कार्य- | द्वितीय ब्रह्मविषयक होता है; अतः प्रहाणेन पूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्मस्व- | ब्रह्मज्ञानके अनन्तर अविद्या और रूपोऽवतिष्ठते । ध्यानस्य पुनः | उसके कार्यकी निवृत्ति हो जानेसे सहसा न निराकारे बुद्धिः प्रवर्तत | विद्वान् पूर्णानन्दाद्वितीय ब्रह्मस्वरूपसे इति सविशेषब्रह्मविषयत्वात् “तं | ही स्थित हो जाता है । किन्तु यथा यथोपासते…” इति न्यायेन | ध्यानजनित बुद्धि सहसा निराकार सविशेषविश्वैश्वर्यलक्षणब्रह्मप्राप्त्या | ब्रह्ममें प्रवृत्त नहीं होती, अतः वह विश्वैश्वर्यमनुभूय निर्विशेषपूर्णा- | सविशेष ब्रह्मविषयक होनेसे “उसकी नन्दब्रह्मात्मानं ज्ञात्वा केवलात्म- | जिस-जिस प्रकार उपासना करता कामोऽवाप्ताशेषपुमर्थो मुक्तो | है उसी प्रकार फल मिलता है” इस भवति । | न्यायसे सर्वैश्वर्यरूप सविशेष ब्रह्मकी | प्राप्तिसे वह सम्पूर्ण ऐश्वर्यका अनुभव | कर फिर निर्विशेष पूर्णानन्दस्वरूप | ब्रह्मको आत्मभावसे जानकर केवल | आत्मकामी हो सम्पूर्ण पुरुषार्थको | प्राप्त करके मुक्त हो जाता है । तथा शिवधर्मोत्तरे ध्यानज्ञान- | इसी प्रकार शिवधर्मोत्तरमें भी योर्विश्वैश्वर्यलक्षणं केवलात्मकामा- | ध्यान और ज्ञानके क्रमशः विश्वैश्वर्य- प्तकामलक्षणं च फलं दर्शयति— | रूप और केवल आत्मकाम एवं | आप्तकामरूप फल दिखाये हैं—