भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 276 में से

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पृष्ठ 133

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११९ ᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆

स भूय एवेन्धनयोनिगृह्य- स्तद्वोभयं वै प्रणवेन देहे ॥१३॥

जिस प्रकार अपने आश्रय [ काष्ठ ] में स्थित अग्निका रूप दिखायी नहीं देता और न उसके लिङ्ग ( सूक्ष्मस्वरूप ) का ही नाश होता है और फिर ईंधनरूप कारणके द्वारा ही उसका ग्रहण हो सकता है उसी प्रकार अग्नि और अग्निलिङ्गके समान ही इस देहमें प्रणवके द्वारा आत्माका ग्रहण किया जा सकता है ॥ १३ ॥

वह्नेर्यथेति। वह्नेर्यथा योनि- | 'वह्नेर्यथा' इत्यादि । जिस प्रकार गतस्यारणिगतस्य मूर्तिः स्वरूपं | योनि अर्थात् अरणिमें स्थित अग्निकी न दृश्यते मथनात्प्राङ्नैव च | मूर्ति–स्वरूपको मन्थनसे पूर्व देखा लिङ्गस्य सूक्ष्मदेहस्य विनाशः। | नहीं जा सकता और न उसके लिंग स एवारणिगतोऽग्निर्भूयः पुनः | यानी सूक्ष्म रूपका नाश ही होता पुनरिन्धनयोनिना मथनेन गृह्यः। | है । तथा अरणिमें स्थित वह अग्नि योनिशब्दोऽत्र कारणवचनः । | फिर ईंधनयोनिसे पुनः-पुनः मन्थन इन्धनेन कारणेन पुनः पुनर्मथ- | करनेपर प्रकट देखा भी जा नाद्गृह्यः। 'तद्वोभयम्' इवार्थो | सकता है। यहाँ 'योनि' शब्द वाशब्दः। तच्चोभयं तदुभयमिव | कारणका वाचक है; अर्थात् ईंधनरूप मथनात्प्राङ् न गृह्यते। मथनेन | कारणके द्वारा पुनः-पुनः मन्थन च गृह्यते । तद्वदात्मा वह्निस्था- | करनेपर वह ग्रहण किया जा सकता | है । 'तद्वा उभयम्' यहाँ वा शब्द | इव ( सादृश्य ) अर्थमें है । अर्थात् | उन दोनों (अग्नि और अग्नि-लिंग) के | समान, जैसे मन्थनसे पूर्व उनका | ग्रहण नहीं होता था किन्तु मन्थन | करनेपर वे दिखायी देने लगते हैं, | उसी प्रकार अग्निस्थानीय आत्मा